हरफ़े अव्वल (प्राक्कथन)
नहजुल
बलाग़ा उलूम व
मआरिफ़ (ख़ुदा
शिनासी) का वह गरां
बहा (बेश क़ीमत)
सरमाया है कि जिस
की अहमीयत व अज़मत
हर दौर में मुसल्लम
रही है। और हर अहद
(ज़माने) के उलमा
व उदबा ने उस की
बुलंद पायगी का
ऐतेराफ़ किया है।
यह सिर्फ़ अदबी
शाहकार नही ही
नही है, बल्कि इस्लामी
तालीमात का इलहामी
सहीफ़ा हिकमतों
अख़लाक़ का सर
चश्मा और मआरिफ़े
ईमान व हक़ाइक़े
तारीख़ का एक अनमोल
ख़ज़ाना है, जिस
के गौहरे आबदार
इल्म व अदब के दामन
को ज़र निगार बनाये
हुये हैं। और अपनी
चमक दमक से जौहर
शिनासों को महवे
हैरत किये हुये
है, अफ़सहुल अरब
के आग़ोश में पलने
वाले और आबे वहइ
में धूली हुई ज़बान
चूस कर परवान चढ़ने
वाले ने बलाग़ते
कलाम के वह जौहर
दिखाये कि हर सम्त
में फ़ौक़ा कलामुल
मख़लूक़ तहता कलामुल
ख़ालिक़ (मख़लूक़
के कलाम से बुलंद,
ख़ालिक़ के कलाम
से पस्त) की सदायें
बुलंद होने लगीं।
यह
नस्र उस दौर की
नस्र है जब अरबों
की तलाक़त (तेज़
ज़बानी) व जोश गुफ़तारी
सिर्फ़ नज़्म
(शाइरी) तक महदूद
थी। रेगज़ारे अरब
पर बिस्तर लगा
के आज़ादी की फ़ज़ा
में पुर बहार ज़िन्दगी
गुज़ारने वाले
फ़रज़न्दाने सहरा
शेरो नज़्म और
तख़ईल व महाकात
के ला ज़वाल नुक़ूश
तो छोड़ गये मगर
जहां तक नस्र का
ताअल्लुक़ है उन
के दामन में कोई
ऐसा गौहर शाहवार
न था जिसे ब तौरे
तफ़ाख़ुर पेश करते
और अहले इल्म को
अपने मुक़ाबले
में ललकारते। दामने
इस्लाम में अगर
चे क़ुरआने करीम
ऐसा अरबी नस्र
का ज़िन्द ए जावेद
मौजिज़ा मौजूद
है मगर वह अपने
क़ाइल की अज़मत
व जलालत और ऐजाज़े
फ़साहत व बलाग़त
क लिहाज़ से इंसानी
कलाम के मुक़ाबले
में नही लाया जा
सकता और पैग़म्बरे
इस्लाम (स) के अक़वाल
व इरशादात हैं
तो वह अगर चे मअनवी
लिहाज़ से वसीइ
और हमागीर हैं
मगर लफ़्ज़ी ऐतेबार
से इख़्तिसार बदामां।
चुनांचे पैग़म्बरे
अकरम (स) का इरशाद
ऊतीतो जवामेउल
कलिम, इस का शाहिद
है कि आप कम से कम
लफ़्ज़ों में ज़ियादा
से ज़ियादा मतालिब
समेट लेते थे।
इसी लिये आप के
ख़ुतब व मकातीब
(तक़रीरें व तहरीरें)
मुख़्तसर होते
थे। रही ख़ुलफ़ा
की नस्र तो इस में
फ़ितरी हुस्ने
अदा और तबई सादगी
के बजाय बनावट
और तसन्नो का रंग
झलकता है और तारीख़
शाहिद है कि उन्हे
मुख़्तसर से मुख़्तसर
तक़रीर के लिये
भी ख़ुसूसी तैयारी
की ज़रुरत होती
थी और अगर कहीं
बग़ैर तैयारी के
खड़ हो गये तो दहन
में क़ुफ़्ल पड़
गये। ज़बान लड़खड़ाने
लगी और मुंह से
एक लफ़्ज़ न निकाल
सके। अगर चे मुल्की
फ़ुतूहात के सिलसिले
में उन के कारहा
ए नुमायां नज़र
आते हैं। मगर किसी
इल्मी व सक़ाफ़ती
मरकज़ की सर परस्ती
या किसी इल्मी
तहरीक में गाम
फ़रसाई कहीं नाम
को नज़र नही आई।
यह बाबे मदीनतुल
इल्म ही की ज़ात
थी जिस ने इल्मो
हिकमत के बंद दरवाज़े
खोले, नुतक़ो फ़साहत
के परचम लहराये
और इल्मी ज़ौक़
को फिर से ज़िन्दा
किया। बा वजूदे
कि आप का दौर सुकूनो
इतमीनान से यकसर
ख़ाली था और हवसे
इक़्तेदार की फ़ितना
सामानियों ने उसे
अपनी जौलान गाह
बना रखा था और शोरिश
पसंदों ने ख़ूने
उस्मान को हवा
दे कर आप को लड़ाईयों
में उलझाये रखना
ही अपने मक़ासिद
के लिये ज़रूरी
समझ लिया था। मगर
इन रात दिन की लड़ाईयों
और चपक़लिशों
(नोक झोंक) के बावजूद
आप नशरे उलूमो
मआरिफ़ के किसी
मौक़े को हाथ से
न जाने देते थे।
कभी तलवारों की
झंकार और ख़ून
की बारिश में इल्मो
हिकमत के रुमूज़
बताये और कभी ज़ेहनी
उलझाव और अफ़कार
के हुजूम में इरशाद
व हिदायत के फ़राइज़
अंजाम दिये। चुनांचे
इस मजमूए के ख़ुतब
व मकातीब में दो
चार ख़ुतबों और
एक आध ख़त के अलावा
तमाम तहरीरें उसी
दौर की तख़लीक़
हैं कि जब आप ज़ाहिरी
ख़िलाफ़त पर एक
दिन भी इतमीनान
व दिल जमई से न बैठ
सके थे। यह बलाग़त
के रगो पय में सरायत
कर जाने के नतीजा
है कि उस इंतेशारो
पराकंदगिये ख़ातिर
के बा वजूद न आप
के कलाम में इंतेशार
व बरहमी पैदा होती
है, न इबारत के तसलसुल
व हम आहंगी में
फ़र्क़ आने पाता
है और हर मौक़े
पर उसलूबे बयान
की यकरंगी अपने
ख़ुसूसी इम्तेयाज़ात
के साथ बर क़रार
रहती है।
अमीरुल
मोमिनीन अलैहिस
सलाल ने इल्मी
हक़ाइक़ को फ़रोग़
देने के साथ साथ
इल्मो अदब के नशवो
नुमा में भी पूरा
हिस्सा लिया। और
अरबी नस्र को न
सिर्फ़ हद्दे कमाल
तक पहुचाया बल्कि
फ़लसफ़ियाना नज़र
व फ़िक्र को अदबी
लताफ़तों में समो
कर एक नये तर्ज़े
तहरीर की दाग़
बेल डाली। जिस
की उस ज़माने में
कोई मिसाल नही
मिलती। अरब तो
ख़ैर उस वक़्त
में मनतक़ियाना
अंदाज़े इस्तिदलाल
से रुशनास ही न
थे कि उस दौर में
उस की मिसाल ढ़ूंढी
जाये। आज भी जब
कि नस्र तरक़्क़ी
के मदारिज तय कर
चुकी है और अदबी
व फ़न्नी इरतेक़ा
अपने नुक़्त ए
कमाल को पहुच चुका
है उस की नज़ीर
नही मिल सकती।
अगर किसी कलाम
में मआनी व बयान
की मुनासिबतें
और तशबीह व इसतेआरा
की लताफ़ते पाई
जाती हैं तो वह
हिकमत व अख़लाक़
के तालीमात से
तही दामां है और
अगर किसी में हिकमतो
अख़लाक़ के जौहर
भरे हुए हैं तो
तरज़े अदाइगी की
शगुफ़्तगी और रंगीनी
ग़ायब है। फ़लसफ़ा
व हिकमत के हक़ाइक़
और इलाहीयात के
दक़ीक़ मसाइल को
इस तरह बयान करना
कि कलाम की बलाग़त,
बयान की नुदरत
और तरज़े अदा की
लताफ़त में कहीं
झोल न आये, बहुत
दुशवार है। क्यों
कि हर फ़न का एक
ख़ास लबो लहजा,
ख़ास पैराया और
ख़ास तरीक़ ए बयान
होता है और यह मानी
हुई बात है कि इल्मी
मतालिब में न बलीग़ाना
तअबीरात की गुंनाइश
होती है और न उन
में अअला मेअयारे
बलाग़त को बाक़ी
रखा जा सकता है
क्यों कि ठोस हक़ाइक़
की वादी और है और
बलाग़त का पुर
बहार चमन और है।
चुनांचे इब्ने
ख़ल्लदून को यह
कहना पड़ा कि उलमा
व फ़ुक़हा की तहरीरों
में फ़साहत व बलाग़त
ढूंढ़ना बेकार
है क्यों कि फ़िक़ही
इबारतें कलाम व
जदल की तहरीरें
इल्मी व फ़न्नी
तअबीरें उसलूबे
बलाग़त से मेल
नहीं खातीं।
अहले
फ़न के ज़ेहनों
में जो मख़सूस
तअबीरात महफ़ूज़
होती हैं, वह उन्ही
को दोहराने पर
मजबूर होते हैं।
वह अगर अपने बयान
में शेरीयत लाना
भी चाहेगें तो
हिर फिर के वही
लफ़्ज़े, वही तअबीरें
होगीं जो उन की
ज़बानों पर चढ़
कर मंझ चुकी है।
चुनांचे इब्ने
ख़ल्लदून ने लिखा
है कि अबुल क़ासिम
बिन रिज़वान ने
एक दफ़ा अब्बास
बिन शुऐब के सामने
शायर का यह शेर
पढ़ा:
मैं जब दोस्त के
खंडरों के पास
ठहरा तो न जान सका
कि नये और पुराने
खंडरों में क्या
फ़र्क़ है।
तो
अबुल अब्बास ने
फ़ौरन कहा कि यह
किसी फ़क़ीह का
शेर मालूम होता
है। उसने कहा कि
मशहूर फ़क़ीह इबनुन
नहवी का शेर है
मगर आप को कैसे
अंदाज़ा हुआ? अबुल अब्बास ने
कहा इस में लफ़्ज़े
मलफ़र्क़ बबांगे
दुहल पुकार रही
है कि मैं किसी
फ़क़ीह की ज़बान
से निकली हूँ।
भला इस लफ़्ज़
को बलाग़त और उसलूबे
कलामे अरब से क्या
वासिता और फ़िक़ही
ज़बान को शेरो
सुख़न की ज़बान
से क्या लगाव? लेकिन अमीरुल
मोमिनीन अलैहिस
सलाम के कलाम की
यह नुमायां ख़ुसूसीयत
है कि उस में अदब
की सहर अंगेज़ी
और इल्मो हिकमत
की बारीक निगाही
दोनो सिमट कर जमा
हो गई हैं किसी
पहलू में भी कमज़ोरी
का शाइबा तक नही
आने पाता हज़रत
अली बिन अबी तालिब
अलैहिस सलाम वह
पहले मुफ़क्किरे
इस्लाम हैं, जिन्होने
ख़ुदा वंदे आलम
की तौहीद और उस
के सिफ़ात पर अक़्ली
नुक़्त ए नज़र
से बहस की है और
इस सिलसिले में
जो ख़ुतबे इरशाद
फ़रमाये हैं वह
इल्मे इलाहीयात
में नक़्शे अव्वल
भी हैं और हरफ़े
आख़िर भी। उन की
बुलंद नज़री और
मअना आफ़रीनी के
सामने हुकमा व
मुतकल्लेमीन की
ज़ेहनी रसाईयां
ठिठक कर रह जाती
हैó और नुक्ता रस तबीयतों
को अज्ज़े ना रसाई
का ऐतेराफ़ करन
पड़ता है। बिला
शुबहा जिन लोगों
ने इलाहियाती मसाइल
में इल्मो दानिश
के दरिया बहाये
हैं उन का सर चश्मा
आप ही के हकीमाना
इरशादात हैं। यूं
तो मख़लूक़ात की
नैरंगियों से ख़ालिक़
की सनअत आफ़रिनियों
पर इस्तिदलाल किया
ही जाता है, लेकिन
जिस तरह अमीरुल
मोमिनीन अलैहिस
सलाम दुनिया ए
काइनात की छोटी
से छोटी और पस्त
से पस्त मख़लूक़
में नक़्क़ाशे
फ़ितरत की नक़्श
आराइयों की तस्वीर
ख़ीच कर सानेए
के कमाले सनअत
और उस की क़ुदरत
व हिकमत पर दलील
क़ाइम करते हैं
वह नुदरत बयानी
व एजाज़ कलामी
में अपना जवाब
नही रखती। इस मौक़े
पर सिर्फ़ ताऊस
की ख़ुश ख़रामी
और उस के पर व बाल
की रंगीनी व रअनाई
ही नज़रों को जज़्ब
नही करती बल्कि
चमगादड़, टिड्डी
और च्यूंटी ऐसी
रौंदी हुई और ठुकराई
हुई मख़लूक़ का
दामन भी फ़ितरत
की फ़य्याज़ियों
से छलकता हुआ नज़र
आता है।
इन
ख़ुतबात व निगारिशात
में माबअदुत्तबीआती
व नफ़्सीयाती मसाइल
के अलावा अख़लाक़ी,
तमद्दुनी, मुआशेरती,
उसूले अदलो दाद
ख़्वाही के हुदूद,
हर्ब व ज़र्ब के
ज़वाबित और उम्माल
व मुहस्सिलीने
ज़कात के लिये
भी हिदायात नुमायां
हैसियत रखती है।
और एक ऐसा मुकम्मल
व जामेअ दस्तूरे
हुकूमत भी इन सफ़हात
की ज़ीनत है जिस
की अफ़ादीयत इस
तरक़्क़ी याफ़्ता
दौर में भी मुसल्लम
है कि जब सियासते
मदनी के उसूल और
जमहूरी व ग़ैर
जमहूरी हुकूमतों
के आईन मुनज़बित
हो चुके हैं। यह
सिर्फ़ नज़रियाती
चीज़ नही बल्कि
एक अमली लाइहा
है, जिस पर मुसलमानाने
आलम बड़ी आसानी
से अमल पैरा हो
कर दुनयवी व उख़रवी
इरतेक़ा के अअला
मदारिज पर पहुच
सकते हैं।
इन
तहरीरों में उलामा
ए दुनिया व फ़ुक़हा
ए सूउ की फ़रेब
कारियों से भी
मुतनब्बेह किया
है कि जिन्हे इल्म
से तो कोई लगाव
नही होता, मगर उलमा
का रुप धार कर मसनदे
क़ज़ा पर बैठ जाते
हैं और इल्मो मशीख़त
की दुकान सजा कर
दीन फ़रोशी करते
हैं कि अज़ीं ख़ूबतर
तिजारत नीस्त।
कि इस से बेहतर
कोई तिजारत नही
है।)
बअज़
लोगों का ख़्याल
यह है कि नहजुल
बलाग़ा के तअलीमात
दुनयवी तअमीर व
तरक़्क़ी में सद्दे
राह हैं। बेशक
अमीरुल मोमिनीन
अलैहिस सलाम उस
तरक़्क़ी व फ़रावानिये
दुनिया के ख़्वाहा
न थे, जो इस्लाम
की सादगी को क़ैसरो
किसरवी रंग में
रंग दे। बल्कि
उन का अस्ल मक़सद
हमेशा रूहानी तरक़्क़ी
व अख़लाक़ी बुलंदी
रहा। लेकिन इस
के साथ वह रहबानियत
का दर्स न देते
थे। चुनांचे बसरा
में जब आसिम बिन
ज़ियाद के मुतअल्लिक़
उस के भाई ने आप
से गिला किया कि
वह घर बार और ज़नो
फ़रजंद को छोड़
कर गोशा गुंज़ी
हो गया है तो हज़रत
ने उसे बुलाया
और सख़्ती से डांटा
कि वह इस ढोंग को
जल्दी ख़त्म करे
और दुनिया की नेमतों
से बहरामंद हो।
नहजुल बलाग़ा में
जहां जहां तरके
दुनिया का तालीम
है, उस से इस क़िस्म
की रहबानियत क़तअन
मुराद नही है।
बल्कि मक़सद यह
है कि इंसान दुनियावी
सरो सामान पर भरोसा
न कर बैठे कि यह
सुबह है तो शाम
नही, और शाम है तो
सुबह नही, और इस
की कामरानियों
और दिल फ़रेबियों
में खो कर हयात
बाअदल मौत से ग़ाफ़िल
न हो जाये। यह मक़सद
नही कि उस की नेमतों
और आसाइशों से
कुल्लीयतन दस्त
बरदार हो जाये।
वह उन्हे हद्दे
ऐतेदाल में रह
कर इस्तेमाल कर
सकता है। अलबत्ता
दुनिया के बे ऐतेदिलाना
इस्तेमाल, जहां
अख़लाक़ी तबाही
का पेश ख़ैमा और
रूहानी ज़िन्दगी
को लिये ज़हरे
हलाहल बन जाये,
कोई अख़लाक़ी रहनुमा
इस की इजाज़त नही
दे सकता।
नहजुल
बलाग़ा अख़लाक़ी
तालीमात का सर
चश्मा है। इस के
मुख़्तसर जुमले
और ज़रबुल मसलें,
अख़लाक़ी शाइस्तगी,
ख़ुद ऐतेमादी,
हक़ गोई और हक़ीक़त
शनासी का बेहतरीन
दर्स देती है।
इस के एक एक फ़िक़रे
में क़ुरआन व हदीस
की रूह और इस्लाम
की सहीह तअलीम
मुज़मर है। जिन
लोगों ने उमवी
व अब्बासी दौर
की नग़मा बार व
हुस्न पाश रंगीनियों
से इस्लामी हयात
का अंदाज़ा लगाया
है, वह इस्लाम की
पाक बाज़ाना तअलीम
और उस के बुलंद
मेअयारे अख़लाक़
से बेगाना हैं
और उस वक़्त तक
बेगाना रहेगें
जब तक इस मुअल्लिमे
इस्लाम के हिकमत
आगीं कलाम के आईने
में इस्लाम के
ख़द्दो ख़ाल को
पहचानने और उस
के बुलंद पाया
असरारो नुकात तक
पहुचने की कोशिश
न करेगें।
अल्लामा
शरीफ़ रज़ी का
दुनिया ए इल्मो
अदब पर बड़ा एहसान
है कि वह इन जवाहिर
रेज़ों को बड़ी
काहिश व काविश
और तहक़ीक़ व जुस्तुजू
से जमा करने के
बाद नहजुल बलाग़ा
के नाम से छोड़
गये। जिस के बुलंद
पाया हिकम व मआरिफ़
ने दुनिया की नज़रों
तो अपनी तरफ़ मोड़
लिया। अल्लामा
ममदूह के दौर से
ले कर इस वक़्त
तक हर मकतबे ख़्याल
के उलमा व फ़ोज़ला
ने इस के मतालिब
व हक़ाइक़ को ब
क़दरे इमकान वाज़ेह
करने के लिये इस
की शरहे लिखीं
जिन की तादाद सौ
से कुछ ही कम होगी।
लेकिन उर्दू दां
तबक़ा न अस्ल किताब
से मुसतफ़ीद हो
सकता है और न शरहों
तक उस की रसाई है।
इस लिये ज़रुरत
थी कि ज़रूरी तशरीहात
के साथ उस का सहीह
और सलीस उर्दू
में तर्जुमा हो
जाये। यूं तो उर्दू
में इस के कई तर्जुमे
हो चुके हैं मगर
नैरंगे फ़साहत
के अलावा मुकम्मल
तर्जुमा इस वक़्त
तक मंज़रे आम पर
नही आया। लेकिन
उसके मुतअल्लिक़
अफ़सोस से यह कहना
पड़ता है कि उस
में बेशतर मवाक़े
पर मतलब कुछ का
कुछ हो गया है।
मगर उर्दू में
नक़्शे अव्वल होने
की वजह से उस के
फ़स्ले अक़दमीयत
से इंकार नही किया
जा सकता। यह माना
कि असले कलाम के
ख़ुसूसीयात तर्जुमे
में मुन्तक़िल
नही किये जा सकते
और आईन के बिल मुक़ाबिल
फूल रख कर उस की
पत्तियों की तह
में लिपटी हुई
ख़ुशबू की अक्कासी
ना मुम्किन है
कि कोई फूल के अक्स
से ख़ुशबू सूघंने
की तवक़्क़ों करने
लगे मगर फूल की
शक्लो सूरत और
रंग व रूप भी नज़र
न आये तो इस के सिवा
क्या कहा जा सकता
है कि आईना ही धुंधला
है।
इन
हालात में मैं
ने नहजुल बलाग़ा
का तर्जुमा करने
की जुरअत की है।
तर्जुमा जैसा कुछ
भी है, आप के सामने
है, मेरी कोशिश
तो यही रही है कि
मेरे इमकानो हुदूद
तक तर्जुमा सहीह
हो, लेकिन मेरी
कोशिश कहां तक
बार आवर हुई है,
इस का अंदाज़ा
अरबाबे इल्म ही
कर सकते हैं मेरे
सही समझने या कहने
से क्या होता है।
यह तो मुम्किन
ही नही है कि तर्जुमे
में अस्ल की लताफ़त
बलाग़त और अलवी
नुत्क़ व फ़साहत
के जौहर को समोया
जा सके।
जो
हो सकता था वह ज़ाहिरी
अल्फ़ाज़ का एक
हद तक सहीह तर्जुमा
है। चुनांचे इस
के लिये मैं ने
कोई कोशिश उठा
नही रखी। अब इस
से अगर थोड़ी बहुत
झलक भी कलामे इमाम
अलैहिस सलाम की
सामने आ जाये तो
बड़ी बात है।
तर्जुमा
व हवाशी के सिलसिले
में तारीख़ व सीयर
(सीरत) और रेजाल
की किताबों अलावा
नहजुल बलाग़ा के
मुतअद्दिद तराजिम
व शुरुह भी पेश
नज़र रहे हैं जिन
की तफ़सीली तज़किरा
ज़रुरी नही है।
अलबत्ता जिन शुरुह
(शरहों) से मैं ने
ख़ुसूसियत के साथ
फ़ायदा उठाया है
और जा बजा उन का
हवाला दे दिया
है, उन की ज़िक्र
किया जाता है:
1.
एलामे
नहजुल बलाग़ा,
इस के मुसन्निफ़
अली इब्नुन नासिर
हैं, जो जनाबे सैयद
रज़ी के मुआसिर
(समकालीन) थे। यह
नहजुल बलाग़ा का
सब से पहली शरह
(व्याख्या) है।
गो मुख़्तसर है
लेकिन हल्ले लुग़ात
व तशरीहे मतालिब
के लिहाज़ से बहुत
बुलंद पाया है।
इस का क़लमी नुस्ख़ा
(हस्तलिपि) लखनऊ
में कुतब खाना
(पुस्तकालय) जनाबे
सैयिद तक़ी साहब
अअलल्लाहो मक़ामहू
में मौजूद है।
वहीं से इस को हासिल
(प्राप्त) करके
देखा।
2.
शरहे
इब्ने मीसम, शैख़
कलामुद्दीन मीसम
बिन अली बिन मीसमे
बहरानी मुतवफ़्फ़ी
(मुत्यु) सन् 679 हिजरी
की तसनीफ़ है, जो
उलमाए इमामिया
में बड़ी बुलंद
मरतबा शख़्सियत
के मालिक थे। उनकी
शरहे मअना आफ़रीनी
व दक़ीक़ा संजी
के ऐतेबार से बहुत
शोहरत रखती है।
3.
शरहे
इब्ने अबिल हदीदे
मोअतज़ेली, अबू
हामिद अब्दुल हमीद
बिन हिबतुल्लाह
मअरूफ़ व इब्ने
अबिल हदीद मदायनी
बग़दादी, मुतवफ़्फ़ी
सन् 655 हिजरी की तसनीफ़
है। यह उलामा ए
मोअतज़िलह में
से थे। इन की शरह
शोहरा आफ़ाक़ है
और अहम मतालिब
पर मुशतमिल है
और मिस्र व ईरान
में तबअ हो चुकी
है।
4.
दुर्रए
नजफ़ीया, अलहाद
मीरज़ा इब्राहीम
ख़ूई शहीद सन्
1325 हिजरी की तसनीफ़
है। मशहूर व मुतदिवल
शरह है। शरहे इब्ने
मीसम से मुतअस्सिर
हो कर लिखी है और
इस के इल्मी मतालिब
को अपनी किताब
में क़ालल फ़ाज़िल
(फ़ाज़िल ने फ़रमाया)
कह कर लिखते हैं
और कहीं कहीं पर
उन के नुक़्त ए
नज़र (दृष्टिकोण)
से इख़्तिलाफ़
(मतभेद) भी किया
है। इस में लुग़वी
तशरीहात (शब्द
कोषीय व्याख़्याएं)
बड़ी वज़ाहत (अत्यन्त
स्पष्ट रूप) से
दर्ज है।
5.
मिनहाजुल
बराअह, सैयिद हबीबुल्लाह
ए ख़ूई मुतवफ़्फ़ी
सन् 1326 हिजरी की तसनीफ़
है। यह शरह बहुत
बसीत (विस्तृत)
और तफ़सीली वाक़ेआत
पर मुश्तमिल है।
अकसर मवाक़े पर
इब्ने अबिल हदीद
से उलझे हैं और
कहीं कहीं इब्ने
मीसम पर भी तन्क़ीद
(टिप्पणी) की है।
शरह अरबी में है
और फ़ारसी ज़बान
में तरजुमा भी
साथ साथ हैं।
तशक्कुर व इमतिनान
मैं अपने बुज़ुर्ग
व मोहतरम (आदरणीय)
हज़रत सैयिदुल
उलामा दामा ज़िल्लहू
(जो अब स्वर्गीय
हो चुके हैं) का
समीमे क़ल्ब (तहेदिल)
से शुक़्र गुज़ार
हूँ, जिन्होने
मेरी अर्ज़ दाश्त
(प्रार्थना) पर
तर्जमा व हवाशी
के बेशतर (अधिकांश)
अजज़ा समाअत फ़रमाने
(सुनने) के बाद इस
पर एक बसीत व मुहक़्क़िक़ाना
(विस्तृत एवं अन्वेषणिक)
मुक़द्दमा (प्रस्तावना)
तहरीर फ़रमाया
और मुख़तलिफ़ मवारिद
(अनेक स्थानों)
पर अपने ज़र्रीं
मशवरों (स्वर्णिम
परामर्श) से रहनुमाई
फ़रमाई (नेतृत्व
किया)। ख़ुदा वंदे
आलम आप के फ़ुयूज़
व बरकात तो ता देर
बाक़ी व बर क़रार
रखे। अल अहक़रुल
मुज़निब।