आयत की तफ़सीर:

إِنَّا لِلّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعون

आप ने एक को कलेम ए “قَالُواْ إِنَّا لِلّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعونَ” ज़बान पर जारी करते हुए सुना तो फ़रमाया ये जो हम कहते है “हम सब अल्लाह के लिये हैं” ये बंदगी का इक़रार है। और जो हम ये कहते हैं “हम उसी की तरफ़ वापस जायगें” ये अपने ख़त्म हो जाने का एतिराफ़ है।

फ़लसफऐ हज

وَلِلّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلاً وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ الله غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ

इमाम अली (अ0) इस आयत के पेशे नज़र फ़लसफ़ ए हज को कुछ यूं बयान फ़रमाते:

ख़ुदा ने तुम पर हज को वाजिब क़रार दिया और अपने घर को लोगों के लिये क़िबला बनाया। ख़ुदा ने लोगों पर हज मुक़र्रर किया ताकि लोग उस की अज़मत के सामने सर झुकायें और उसकी इज़्ज़त व क़ुदरत का एतिराफ़ करें। और अपने बंदों में से उन लोगों को चुना है जिन्हों ने उसकी आवाज़ को सुना और उस पर लब्बैक कहा, और हक़ की तस्दीक़ की, और वहां पर क़दम रखा जहां पैग़म्बरों ने क़दम रखा था और उन फ़रिश्तों के हमराह हुए जो अर्शे इलाही का तवाफ़ करते हैं और इस फ़ायदे में जिसका सरमाया इबादत है बहुत फ़ायदा उठाया यहा तक कि उस की मग़फ़िरत को हासिल करने में एक दूसरे पर पेशी की।

ख़ुदा ने हज को अलामत क़रार दिया है और काबे को पनाह तलाश करने वालों के लिये पनाह गाह और हज को वाजिब फ़रीज़ा क़रार दिया और उसके हक़ को वाजिब किया और हज को तुम पर वाजिब किया और फ़रमाया: “इस में खुली हुई निशानियां मक़ामे इब्राहीम है और जो उस मे दाखिल हो जायगा वह महफ़ूज़ हो जायगा और अल्लाह के लिये लोगो पर उसके घर का हज करना वाजिब है अगर इस राह की इस्तिताअत रखते हों और जो काफ़िर हो जाये तो ख़ुदा तमाम आलमीन से बे नयाज़ है”

नेक लोगों के सिफ़ात:

الَّذِينَ يُنفِقُونَ فِي السَّرَّاء وَالضَّرَّاء وَالْكَاظِمِينَ الْغَيْظَ وَالْعَافِينَ عَنِ النَّاسِ وَاللّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ

जो राहत और सख़्ती हर हाल मे इन्फ़ाक़ करते है और ग़ुस्से को पी जाते है और लोगों को माफ कर देते है और ख़ुदा एहसान करने वालों को दोस्त रखता है।

और अमीरुल मोमिनीन (अ0) नेक लोगों की ख़ुसूसियात को यूं बयान फ़रमाते है: ख़बरदार किसी शुक्रया अदा न करने वाले की नालाएक़ी तुम्हे कारे ख़ैर से बद दिल न बना दे। हो सकता है कि तुम्हारा शुक्र वह अदा करे जिस ने उस नेमत से कोई फ़ायदा भी नही उठाया है और जिस क़द्र कुफ़राने नेमत करने वाले वे तुम्हारा हक़ा ज़ाया किया है इस शुक्र आदा करने वाले के शुक्र से बराबर हो जायेगा और वैसे भी अल्लाह नेक काम करने वालों को दोस्त रखता है।

अमीरुल मोमिनीन (अ0) को इस कलाम सो मालूम होता है कि अव्वलन तो इन्सान को कारे ख़ैर में किसी शुक्रिये का इन्तेज़ार नही करना चाहिये क्योकि ये इन्तेज़ार अमल को मजरूह कर देता है जिस की तरफ़ कुरआने मजीद ने इस तरह इशारा किया है “न हम तुम से कोई जज़ा चाहते हैं और न शुक्रया” लेकिन अगर उसके बाद भी इन्सान फ़ितरत से मजबूर हो कर फ़ितरी तौर से शुक्रये का ख़्वाहिश मंद होता है तो मौला ए काऍनात (अ0) ने इसका भी इशारा दे दिया है कि ये कमी दूसरे अफ़राद की तरफ़ से पूरी हो जायगी और वह तुम्हारे कारे ख़ैर की क़द्र दानी करके शुक्रिये की कमी का तदारुक कर देगा। (बाक़ी आइन्दा)