ख़ुतबा-218

अमीरुल मोमिनीन (अ) ने आयत, अल हाकुमुत तकासुर हत्ता ज़ुर तुमुल मक़ाबिर, (तुम्हे क़ौम क़बीले की कसरत पर इतराने ने ग़ाफ़िल कर दिया यहां तक कि तुम ने क़ब्रें देख डालीं।) की तिलावत करने के बाद फ़रमाया।)

देखो तो, इन बोसिदा हड्डियों पर फ़ख़्र करने वालो का मक़सद कितना दूर अज़ अक़्ल है, और यह क़ब्रों पर आने वाले फ़ितने ग़ाफ़िल व बे ख़बर हैं, और यह मुहिम सख़्त व दुशवार है। उन्हो ने मरने वालों को कैसी कैसी इबरत आमोज़ चीज़ों से ख़ाली समझ लिया और दूर व दराज़ जगह से उन्हे (सरमाय ए इफ़्तेख़ार बनाने के लिये) ले लिया। क्या यह अपने बाप दादाओं की लाशों पर फ़ख़्र करते हैं या हलाक होने वालों की तादाद से अपनी कसरत में इज़ाफ़ा महसूस करते हैं, वह इन जिस्मों को पलटाना चाहते हैं जो बे रुह हो चुके हैं, और उन जुबिंशों को लौटाना चाहते हैं, जो थम चुकी हैं। वह सब बे इफ़्तेख़ार बनने से ज़ियादा सामाने इबरत बनने के क़ाबिल हैं।

उन की वजह से इज्ज़ व फ़रोतनी की जगह पर उतरना, इज़्ज़त व सर फ़राज़ी के मक़ाम पर ठहरने से ज़ियादा मुनासिब है। उन्हो ने चोंधियाई हुई आंख़ों से उन्हे देखा और उन में (इबरत लेने के बजाय) जिहालत के गहराव में उतर पड़े। अगर वह उन की सर गुज़श्त को टूटे हुए मकानों और ख़ाली घरों के सहनों से पूछे तो वह कहेंगे कि वह गुमराही की हालत में ज़मीन के अंदर चले गये, और तुम बे ख़बरी व जिहालत के आलम में उन के अक़ब में बढ़े जा रहो हो। तुम उन की खोपड़ियों को रौंदते हो और उन के जिस्मों की जगह पर इमारतें तामीर करना चाहते हो। जिस चीज़ को उन्हो ने छोड़ दिया है, उस में चर रहे हो, और जिसे वह ख़ाली छोड़ कर चले गये हैं, उस में आ बसे हो। और यह दिन भी जो तुम्हारे और उन के दरमियान है, तुम पर रो रहें हैं, और नौहा पढ़ा रहे हैं। तुम्हारी मंज़िले मुन्तहा पर पहले से पहुच जाने वाले, और तुम्हारे सर चश्मों पर क़ब्ल से वारिद होने वाले वही लोग हैं जिन के लिये इज़्ज़त की मंज़िले तुम्हे और फ़ख्र व सर बुलंदी की फ़रावानी थी। कुछ ताजदार थे, कुछ दूसरे दर्जे के बुलंद मंसब, मगर अब तो वह बरज़ख़ की गहराइयों में राह पैमा हैं, कि जहां ज़मीन उन पर मुसल्लत कर दी गई है, जिस ने उन का गोश्त खा लिया और लहू चूस लिया है। चुनांचे वह क़ब्र के शिगाफ़ों में नश्व व नुमा खो कर जमाद की सूरत में पड़े हैं और यूं नज़रों से ओझल हो गये हैं, कि ढ़ूढ़ने से नही मिलते। न पुर हौल ख़तरात का आना उन्हे ख़ौफ़ ज़दा करता है, न हालात का इंक़ेलाब उन्हे अंदोह नाक बनाता है। न ज़लज़लों की परवाह करते हैं, न रअद की कड़क पर कान धरते हैं। वह ऐसे ग़ायब हैं कि जिन का इंतेज़ार नही किया जाता, और ऐसे मौजूद हैं कि सामने नही आते। वह मिल जुल कर रहते थे जो अब बिखर गयें हैं, और आपस में मेल मुहब्बत रखते थे जो अब जुदा हो गये हैं। उन के वाक़ेयात से बे ख़बरी और उन के घरों की ख़ामोशी इमतिदादे ज़माना और दूरि ए मंज़िल की वजह से नहीं, बल्कि उन्हे मौत का ऐसा साग़र पिला दिया गया है कि जिस ने उन की गोयाई छीन कर उन्हे गूंगा बना दिया है और क़ुव्वते शनवाई (सुनने की शक्ति) सल्ब कर के बहरा कर दिया है। और उन की हरकत व जुंबिश को सुकून व बेहिसी से बदल दिया है, गोया कि वह सरसरी नज़र में यूं देखाई देते हैं जैसे नींद में लेटे हुए हों। वह ऐसे हमसायें हैं जो एक दूसरे से उन्स व मुहब्बत का लगाव नही रखते, और ऐसे दोस्त हैं जो आपस में मिलते मिलाते नहीं। उन के जान पहचान के राब्ते बोसिदा हो चुके हैं, और भाई बंदी के सिलसिले टूट गये हैं। वह एक साथ होते हुए भी अकेले हैं और दोस्त होते हुए भी अलाहिदा व जुदा हैं। यह लोग शब हो तो उस की सुबह से बे ख़बर, और दिन हो तो उस की शाम से ना आशना हैं। जिस रात या जिस दिन में उन्हो ने रख़्ते सफ़र बांधा है, वह साअत (घड़ी) उन पर हमेशा और यकसां रहने वाली है। उन्हो ने मंज़िले आख़िरत की हौल नाकियों को इस से भी कहीं ज़्यादा हौल नाक पाया जितना उन्हे डर था। और वहां के आसार (लक्षणों) को उस से अज़ीम तर (अधिक महान) देखा जितना वह अंदाज़ा लगाते थे। मोमिनों और काफ़िरों की मंज़िले इंतेहा को जाय बाज़ गश्त (दोज़ख़ व जन्नत) तक फैला दिया गया है। वह क़ाफ़िलों के लिये हर दरजा ख़ौफ़ से बुलंद तर मोमिनों के लिये हर दर्जा उम्मीद से बाला तर है। अगर वह बोल सकते होते, जब भी देखी हुई चीज़ों के बयान से उन की ज़बाने गुंग हो जातीं। अगर चे उन के निशानात मिट चुके हैं और उन की ख़बरों का सिलसिला मुनक़तअ हो चुका है लेकिन चश्मे बसीरत उन्हे देखती और गोशे अक़्ल व ख़िरद उन की सुनते हैं।

वह बोले.... मगर नुत्क़ व कलाम के तरीक़े पर नहीं, बल्कि उन्हो ने ज़बाने हाल से कहा.... शगुफ़्ता चेहते बिगड़ गये, नर्म व नाज़ुक बदन मिट्टी में मिल गये, और हम ने बोसिदा कफ़न पहन रखा है, और क़ब्र की तंगी ने हमें आजिज़ कर दिया है, ख़ौफ़ व दहशत का एक दूसरे से विरसा पाया है। हमारी ख़ामोश मंज़िलें वीरान हो गई। हमारे जिस्म की रअनाइयां मिट गई, हमारी जानी पहचानी हुई सूरतें बदल गई। इन वहशत कदों में हमारी मुद्दते रहाइश दराज़ हो गई। न बेचैनी से छुटाकारा नसीब है, न तंगी से फ़राख़ी हासिल है। अब इस आलम में कि जब कीड़ों की वजह से उन के कान समाअत (श्रवणा शक्ति) को खो कर बहरे हो चुके हैं, और उन की आंख़े ख़ाक का सुरमा लगा कर अंदर को धंस चुकी हैं, और उन के मुंह में ज़बाने तलाक़त व रवानी दिखाने के बाद पारा पारा हो चुकी हैं। और सीनों में दिल चौकन्ना रहने के बाद बे हरकत हो चुके हैं, और उन के एक एक उज़्व (अंग) को इंतेहाई बोसिदगीयों ने तबाह कर के बद हैअत बना दिया है, और इस हालत में कि वह (हर मुसीबत सहने के लिये) बिला मुज़ाहेमत आमादा हैं। उन की तरफ़ आफ़तों का रास्ता हमवार कर दिया है, न कोई हाथ है, जो उन का बचाव करे और न (पसीजने वाले) दिल हैं जो बेचैन हो जायें। अगर तुम अपनी अक़्लों में उन की नक़्शा जमाओ, या यह कि तुम्हारे सामने से उन पर पड़ा हुआ पर्दा हटा दिया जाये तो अलबत्ता तुम उन के दिलों के अंदोह और आंख़ों में पड़े हुए ख़स व ख़ाशाक को देखोगे कि उन पर शिद्दत व सख़्ती की ऐसी हालत है कि वह बदलती नही, और ऐसी मुसीबत व जां काही है कि हटने का नाम नही लेती, और तुम्हे मालूम होगा कि ज़मीन ने कितने बा वक़ार जिस्मों और दिल फ़रेब रंग रुप वालों को खा लिया, जो रंज की घड़ियों में भी मसर्रत अंगेज़ चेहरों से दिल बहलाते थे। अगर कोई मुसीबत उन पर आती थी, तो अपने ऐश की ताज़गियों पर ललचाये रहने, और खेल तफ़रीह पर फ़रेफ़्ता होने की वजह से ख़ुश बख़्तियों के सहारे ढ़ूढ़ते थे। इसी दौरान में कि वह ग़ाफ़िल व मदहोश करने वाली ज़िन्दगी की छांव में दुनिया को देख देख कर हंस रहे थे। और दुनिया उन्हे देख देख कर क़हक़हे लगा रही थी, कि अचानक ज़माने ने उन्हे कांटों की तरह रौंद दिया और उन के सारे ज़ोर तोड़ दिये, और क़रीब ही से मौत की नज़रें उन पर पड़ने लगीं, और ऐसा ग़म व अंदोह उन पर तारी हुआ कि जिस वह आशना न थे, और ऐसे अंदरुनी क़लक़ में मुबतला हुए कि जिस से कभी साबिक़ा न पड़ा था, और इस हालत में कि वह सेहत से बहुत मानूस थे, उन की मरज़ की कमज़ोरियां पैदा हो गई तो अब उन्हो ने उन्ही चीज़ों की तरफ़ रुजूए किया जिन का तबीबों ने आदी बना रखा था, गर्मी के ज़ोर को सर्द दवाओं से फ़रो किया जाये और और सर्दी को गर्म हवाओं से हटाया जाये। मगर सर्द दवाओ ने गर्मी को बुझाने के बजाय और भड़का दिया और गर्म दवाओं ने ठंडक को हटाने के बजाय उस का जोश और बढ़ा दिया, और न उन तबीअतों में महफ़ूज़ होने वाली चीज़ों से उन के मिज़ाज नुक़्त ए ऐतेदाल पर आये। बल्कि उन चीज़ों ने हर उज़वे माऊंफ़ का आज़ार और बढ़ा दिया। यहां तक कि चारा गर सुस्त पड़ गये, तीमार दार मायूस हो कर ग़फ़लत बरतने लगे, घर वाले मरज़ की हालत बयान करने से आजिज़ आ गये। और मिज़ाज पुर्सी करने वाले के जवाब से ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली। और उस से छिपाते हुए उस अंदोह नाक ख़बर के बारे में इख़्तेलाफ़े राय करने लगे। एक कहने वाला यह कहता था कि इस की हालत जो है सो है, और एक सेहत व तंदरुस्ती के पलट आने की उम्मीद दिलाता है, और एक उस की (होने वाली) मौत पर उन्हे सब्र की तलक़ीन करता था, और इस से पहले गुज़र जाने वालों की मुसीबतें उन्हे याद दिलाता था। इसी असना में कि वह दुनिया से जाने और दोस्तों को छोड़ने के लिये पर तोल रहा था, कि नागाह गुलूगीर फंदों में से एक ऐसा फंदा उसे लगा कि उस के होश व हवास पाशान व परेशान हो गये, और ज़बान की तरी ख़ुश्क हो गई, और कितने ही मुब्हम सवालात थे कि जिन के जवाब वह जानता था मगर बयान करने से आजिज़ हो गया, और कितनी ही दिल सोज़ सदायें उस के कान से टकराई कि जिन के सुनने से बहरा हो गया। वह आवाज़ या किसी ऐसे बुज़ुर्ग की होती थी जिस का वह बड़ा ऐहतेराम करता था, या किसी ऐसे ख़ुर्द साल की होती थी जिस पर मेहरबान व शफ़ीक़ था। मौत की सख़्तियां इतनी हैं कि मुश्किल हैं कि दायर ए बयान में आ सकें या अहले दुनिया की अक़्लों के अंदाज़ों पर पूरी उतर सकें।

इस आयत की शाने नुज़ूल यह कि बनी अब्दे मनाफ़ और बनी सहम माल व दौलत की फ़रा वानी और अफ़रादे क़बीला की कसरत पर आपस में तफ़ाख़ुर करने लगे और हर एक अपनी कसरत दिखाने के लिये अपने मुर्दों को भी शुमार करने लगा। जिस पर यह आयत नाज़िल हुई कि तुम्हे माल व औलाद की कसरत ने ग़ाफ़िल कर दिया है। यहां तक कि तुम ने ज़िन्दों के साथ मुर्दों को भी शुमार करना शुरु कर दिया। इस आयत के एक मअनी यह भी कहे गये हैं कि माली औलाद की फ़रावानी ने तुम्हे ग़ाफ़िल कर दिया है यहां तक तुम मर कर क़ब्रों तक पहुचच गये। मगर अमीरुल मोमिनीन (अ) के इरशाद से पहले मअनी की ताईद होती है।

मतलब यह है कि जो दिन के वक़्त मरते हैं उन की निगाहों में हमेशा दिन ही रहता है। और जो रात के वक़्त मरते हैं उन के लिये रात का अंधेरा नही छटता। क्यों कि वह ऐसे मक़ाम पर है जहां चांद, सूरज की गर्दिश और शबो रोज़ का चक्कर नही होता। इस मज़मून को एक शायर ने इस तरह अदा किया है:

फिर उजाली रात का मंज़र न देखेगा दिन।                                          

सुबह का जलबा न देखेगी कभी शामे फ़िराक़।

ख़ुतबा-219

(आयते क़ुरआन, वह लोग ऐसे हैं जिन्हे तिजारत और ख़रीद व फ़रोख़्त (क्रय विक्रय) ज़िक्रे इलाही से ग़ाफ़िल नही बनाती, की तिलावत के बाद फ़रमाया।)

बेशक अल्लाह सुबहानहू ने अपनी याद को दिलों की सैक़ल (मंझाईस कलई) क़रार दिया है, जिस के बाइस वह (अवामिर व नवाही से बहरा होने के बाद सुनने लगे, अंधेपन के बाद देखने लगे और दुश्मनी के बाद इनाद (दुष्भावना) के बाद फ़रमां बरदार (आज्ञा कारी) हो गये। यके बाद दीगरी हर अहद और अंबिया से ख़ाली दौर में हज़रत रब्बुल इज़्ज़त के कुछ मख़्सूस बंदे हमेशा मौजूद रहे हैं कि जिन की फ़िकरों में सर गोशियों की सूरत में (हक़ाइक़ व मआरिफ़ का) इल्क़ा करता है, और उन की अक़्लों से इल्हामी आवाज़ों के साथ कलाम करता है। चुनांचे उन्हो ने अपनी आंखों, कानों और दिलों में बेदारी के नूर से (हिदायत व बसीरत के) चिराग़ रौशन किये। वह मख़्सूस याद रखने (के क़ाबिल) दिनों की याद दिलाते हैं, और उस की जलालत व बुज़ुर्गी से डराते हैं। वह लक़ो दक़ सहरायों (विशाल काय जंगलों) में दलीले राह है। जो मियाना रवी इख़्तियार करता है उस के तौर तरीक़े पर तहसीन व आफ़रीन (प्रशंसा व प्रोत्साहन) करते हैं, और उसे निजात (मुक्ति) की ख़ुश ख़बरी सुनाते हैं, और जो (इफ़रातो तफ़रीत की) दायें बायें सम्तों (दिशाओं) पर हो लेता है, उस के रवैये की मज़म्मत (निंदा) करते हैं, और उसे तबाही व हलाकत के ख़ौफ़ दिलाते हैं। इन्ही ख़ुसूसीयतों (विशेषताओं) के साथ यह अंधयारियों के चिराग़ और उन शुबहों (शंकाओं) के लिये रहनुमा (पथ दर्शक) हैं। कुछ अहले ज़िक्र होते हैं जिन्हो ने यादे इलाही को दुनिया के बदले में ले लिया। उन्हे न तिजारत इस से ग़ाफ़िल रखती है न ख़रीद व फ़रोख़्त, उसी के साथ ज़िन्दगी के दिन बसर करते हैं, और मुहर्माते इलाही (अल्लाह की ओर से वर्जित निषिद्ध) से मुतनब्बेह (सचेत) करने वाली आवाज़ों के साथ ग़फ़लत शियारों के कानों में पुकारते हैं, अदल व इंसाफ़ का हुक्म देते हैं, और ख़ुद भी उस पर अमल करते हैं। बुराइयों से रोकते हैं और ख़ुद भी उस से बाज़ रहते हैं। गोया उन्हो ने दुनिया में रहते हुए आख़िरत तक मंज़िल को तय कर लिया है, और जो कुछ दुनिया के अक़ब में (पीछे) है उसे अपने आंख़ों से देख लिया है, और गोया कि वह अहले बरज़ख़ के उन के छुपे हुए हालात पर, जो उन के तवील अरस ए क़याम में नहीं पेश आये, आगाह हो चुके हैं, और गोया कि क़यामत ने उन के लिये अपने वादों को पूरा कर दिया और उन्हो ने अहले दुनिया के सामने (उन चीजों पर से) पर्दा उलट दिया। यहां तक कि गोया वह सब कुछ देख रहे हैं जिसे दूसरे लोग नही देख सकते, और वह सब कुछ सुन रहे हैं जिसे दूसरे लोग नही सुन सकते। अगर तुम उन की महफ़िलों में उन कू तस्वीर अपने ज़ेहन में खींचो जब कि वह अपने अअमाल नामे को खोले हों और अपने नफ़्सों से हर छोटे बड़े काम का मुसाहिबा करने पर आमादा हों, ऐसे काम कि जिन पर वह मामूर (नियुक्त) थे और उन्हो ने कोताही की, या ऐसे काम जिन से उन्हे रोका गया था और उन की तक़सीर हुई, और हमेशा अपने पुश्तों (पीठों) को अपने गुनाहों से गरां बार महसूस करते रहे हो, कि जिन के उठाने से वह अपने को दरमांदा (असमर्थ) पाते हों, इस लिये रोते रोते उन की हिचकियां बंध गई हों, और बिलक बिलक कर रोते हुए एक दूसरे को जवाब दे रहे हों, और निदामत व एतेराफ़े गुनाह की मंज़िल पर खड़े हुए अल्लाह से चीख़ चीख़ कर फ़रियाद कर रहे हों, तो इस सूरत में तुम्हे हिदायत के निशान और अंधेरों के चिराग़ नज़र आयेंगे कि जिन के गिर्द फ़रिश्तें हल्क़ा किये होंगे। तसल्ली व तस्कीन का उन पर वुरुद हो, आसमान के दरवाज़े उन पर हुए हों, इज़्ज़त की मसनदें उन के लिये मुहैया हों, ऐसी जगह पर कि जहां अल्लाह की नज़रें तवज्जोह उन पर हो, वह उन की कोशिशों से ख़ुश हों, और उन की मंज़िलत पर आफ़रीन करता हो। वह उसे पुकारने की वजह से अफ़्व व बख़्शिश की हवाओं से सांस लेते हों। वह उस के फ़ज़्ल व करम के सामने ज़िल्लत व पस्ती में जकड़े हुए हों। ग़म व बुका की कसरत उन की आंखों को मजरुह कर दिया हो। हर उस दरवाज़े पर उन का हाथ दस्तक देने वाला है जो कि उस की तरफ़ राग़िब व मुतवज्जेह करे। वह उस से मांगते हैं जिस के जूद व करम की पहनाइयां तंग नही होती और न ख़्वाहिश लेकर बढ़ने वाले ना उम्मीद फिरते हैं। तुम अपनी बहबूदी के लिये अपने ही नफ़्स का मुहासिबा करों क्यों कि दूसरों का मुहासिबा करने वाला तुम्हारे अलावा दूसरा है।

 

ख़ुतबा-220

(आयते क़ुरआन, ऐ इंसान, तुझे किस चीज़ ने अपने परवर दिगारे करीम के बारे में धोखा दिया? की तिलावत के वक़्त इरशाद फ़रमाया।)

यह शख़्स जिस से सवाल हो रहा है, जवाब में कितना आजिज़ और यह फ़रेब ख़ुर्दा उज़्र पेश करने में कितना क़ासिर है। वह अपने नफ़्स को सख़्ती से जिहालत में डाले हुए है।

ऐ इंसान, तूझे किस चीज़ ने गुनाहों पर दिलेर (निर्भीक) कर दिया है, और किस चीज़ ने तुझे अपने परवर दिगार के बारे में धोखा दिया है, और किस चीज़ ने तुझे अपनी तबाही पर मुतमइन बना दिया है। क्या तेरे मरज़ के लिये शिफ़ा और तेरे ख़्वाबे (ग़फ़लत) के लिये बेदारी नही है? क्या तुझे अपने ऊप इतना रहम नही आता जितना दूसरों पर तरस खाता है। बसा औक़ात (बहुधा) तू जलती धूप में किसी को देखता है तो उस पर साया कर देता है, या किसी को दर्दो कर्ब में मुबतला पाता है तो उस पर शफ़क़त की बेना पर तेरे आंसू निकल पड़ते हैं। मगर ख़ुद अपने रोग पर तुझे किस ने सब्र दिला दिया है और किस ने तुझे अपनी मुसीबतों पर तवानी कर दिया है, और ख़ुद अपने ऊपर रोने से तसल्ली दे दी है। हालां कि सब जानों में तुझे अपनी जान अज़ीज़ है। और क्यों कर अज़ाबे इलाही के रात ही को डेरा डाल देने का ख़तरा पड़ा हुआ है। दिल की कोताहियों के रोग का चारा अज़्मे रासिख़ से, आंखों के ख़्वाबे ग़फ़लत का मुदावा बेदारी से करो। अल्लाह के मुतीइ व फ़रमां बरदार बनो, और उस की याद से जी लगाओ। ज़रा इस हालत का तसव्वुर करो... वह तुम्हारी तरफ़ बढ़ रहा है और तुम उस से मुंह फेरे हुए हो और वह तुम्हे अपने दामने अफ़्व में लेने के लिये बुला रहा है और अपने लुत्फ़ो एहसान से ढांपना चाहता है, और तुम हो कि उस से रू गर्दां हो कि दूसरी तरफ़ रुख़ किये हुए हो। बुलंद व बरतर है वह ख़ुदा ए क़वी व तवाना कि जो कितना बड़ा करीम है, और तू इतना आजिज़ व नातवां और इतना पस्त हो कर गुनाहों पर कितना जरी और दिलेर है। हालां कि उसी के दामने पनाह में इक़ामत गुज़ीं है और उसी के लुत्फ़ व एहसान की पहनाइयों में उठता बैठता है। उस ने अपने लुत्फ़ व करम को तुझ से रोका नही और न ही तेरा पर्दा चाक किया है। बल्कि उस की किसी नेंमत में जो उस ने तेरे लिये ख़ल्क़ की, या किसी गुनाह में कि जिस पर उस ने पर्दा डाला, या किसी मुसीबत व इब्तेला में कि जिस का रुख़ तुझ से मोड़ा, तू उस के लुत्फ़ व करम से लहज़ा भर के लिये महरुम नही हुआ। यह उस सूरत में है कि तू उस की मअसीयत करता है तो फिर तेरा इस बारे में क्या ख़्याल है? कि अगर तू उस की इताअत करता होता। ख़ुदा की क़सम, अगर यही रवैया दो ऐसे शख्सों में होता जो क़ुव्वत व क़ुदरत में हम पल्ला होते (और उन में से एत ऐसा होता जो बे रुख़ी करता और दूसरा उस पर एहसान करता) तो तू ही अपने नफ़्स पर सब से पहले कज ख़ुल्क़ी व बद किरदारी का हुक्म लगाता। सच कहता हूं कि दुनिया ने तुझ को फ़रेब नही दिया बल्कि तू (ख़ुद जान बूझ कर) उस के फ़रेब में आया है। उस ने तेरे सामने नसीहतों को खोल कर रख दिया और तुझे (हर चीज़) से यकसां तौर पर आगाह कर दिया। उस ने जिन बलाओं को तेरे जिस्म पर तारी होने का वअदा किया है उस में रास्त गो और ईफ़ा ए अहद करने वाली है। बजाय इस के कि तुझ से झूट कहा हो या फ़रेब दिया हो। कितने ही इस दुनिया के बारे में सच्चे नसीहत करने वाले हैं जो तेरे नज़दीक क़ाबिले ऐतेबार हैं और कितने ही उस के हालात को सही सहीह सहीह बयान करने वाले हैं जो झुटलाये जाते हैं। अगर तू टूटे हुए घरों और सुनसान मकानों से दुनिया की मारेफ़त हासिल करे तो तू उन्हे अच्छी याद दहानी और मुवस्सिर पंद देही के लिहाज़ से ब मंज़िलेही एक एक मेहरबान पायेगा कि जो तेरे (हलाकतों में पड़ने से) बुख़्ल (कंजूसी) से काम लेते हैं। यह दुनिया उस के लिये अच्छा घर है जो इसे घर समझने पर ख़ुश न हो, और उसी के लिये अच्छी जगह है जो इसे अपना वतन बना कर न रहे। इस दुनिया की वजह से सआदत की मंज़िल पर कल वही लोग पहुचेंगें जो आज उस से गुरेज़ां हैं।

जब ज़मीन जलज़ले में और क़ियामत अपनी हौल नाकियों के साथ आ जायेगी और हर इबादत गाह से उस के पुजारी और हर मअबूद से उस के परस्तार और हर पेशवा से उस के मुक़तदी मुलहक़ हो जायेंगे तो उस वक़्त फ़ज़ा में शिगाफ़ पैदा करने वाली नज़र और ज़मीन में क़दमों की हल्की चाप का बदला भी उस की अदालत गुस्तरी व इंसाफ़ परवरी के पेशे नज़र हक़ व इंसाफ़ से पूरा पूरा दिया जायेगा। उस दिन कितनी ही दलीलें ग़लत व बे मअना हो जायेगीं और उज़्र व माज़ेरत के बंधन टूट जायेंगे, तो अब उस चीज़ को इख़्तियार करो जिस से तुम्हारा उज़्र क़बूल और तुम्हारी हुज्जत साबित हो सके। जिस दुनिया से तुम को हमेशा बहरायाब (लाभांवित) नही होना उस से वह चीज़ें ले लो जो तुम्हारे लिये हमेशा बाक़ी रहने वाली हैं। अपने सफ़र के लिये तैयार रहो (दुनिया की ज़ुल्मतों में) निजात की चमक पर नज़र न करो और जिद्द व जिहद की सवारियों पर पालान कर लो।

 

ख़ुतबा-221

ख़ुदा की क़सम, मुझे सअदान (कांटेदार झाड़ी जिसे ऊंट चरते हैं) के कांटों पर जागते हुए रात गुज़ारना और तौक़ व ज़ंजीर में मुक़ैयद हो कर घसीटा जाना इस से कहीं ज़ियादा पसंद है कि मैं अल्लाह और उस के रसूल (स) से इस हालत में मुलाक़ात करूं कि मैं ने किसी बंदे पर ज़ुल्म किया हो, या माले दुनिया में से कोई चीज़ ग़स्ब की हो। मैं उस नफ़्स की ख़ातिर क्यों कर किसी पर ज़ुल्म कर सकता हूं जो जल्द ही फ़ना की तरफ़ पलटने वाला और मुद्दतों तक मिट्टी के नीचे पड़ा रहने वाला है।

बख़ुदा मैं ने (अपने भाई) अक़ील को सख़्त फ़क़रो फ़ाक़े की हालत हालत में देखा, यहां तक कि वह तुम्हारे (हिस्से के) गेंहू में से एक स्वाअ मुझ से मांगते थे, और मैं ने उन के बच्चों को भी देखा जिन के बाल बिखरे हुए और फ़क़रो बे नवाइ से रंग तीरगी माइल हो चुके थे गोया उन के चेहरे नील छिड़क कर सियाह कर दिये गये हैं। वह इसरार करते हुए मेरे पास आये और इस बात को बार बार दुहराया। मैं ने उन की बातों को कान दे कर सुना तो उन्हो ने यह ख़्याल किया कि मैं उन के हाथों अपना दीन बेच डालूंगा और अपनी रविश छोड़ कर उन की खींच तान पर उन के पीछे हो जाऊंगा। मगर मै ने किया यह कि एक लोहे के टुकड़े को तपाया और फिर उन के जिस्म के क़रीब ले गया ता कि वह इबरत हासिल करें। चुनांचे वह इस तरह चीख़े जिस तरह कोई बीमार दर्द व कर्ब से चीख़ता है, और क़रीब था कि उन का बदन उस दाग़ देने से जल जाये। फिर मैं ने उन से कहा कि ऐ अक़ील, रोने वालियां तुम पर रोयें, क्या तुम इस लोहे के टुकड़े से चीख़ उठे हो जिसे एक इंसान ने हंसी मज़ाक़ में (बग़ैर जलाने की नीयत के) तपाया है, और तुम मुझे उस आग की तरफ़ खींच रहे हो कि जिसे ख़ुदा ए क़ह्हार ने अपने ग़ज़ब से भड़काया है। तुम तो अज़ीयत से चीख़ो और मैं जहन्नल के शोलों से न चिल्लाऊं? इस से अजीब तर वाक़ेया यह है कि एक शख़्स रात के वक़्त (शहद में) गुंधा हुआ हलवा एक सरबंद बर्तन में लिये हुए हमारे घर पर आया जिस से मुझे ऐसी नफ़रत थी कि महसूस होता था जैसे वह सांप के थूक या उस की क़य से गूंधा गया है। मैं ने उस से कहा, क्या यह किसी बात का इनआम है, या ज़कात है या सदक़ा है जो हम अहले बैत पर हराम है? तो उस ने कहा कि न यह है न वह है बल्कि वह तोहफ़ा है तो मैं ने कहा कि पिसर मुर्दा औरतें तुझ पर रोयें क्या तू दीन की राह से मुझे फ़रेब देने के लिये आया है? क्या तू बहक गया है या पागल हो गया है या यूं ही हिज़यान बक रहा है? ख़ुदा की क़सम, अगर हफ़्त अक़लीम उन चीज़ों समेत जो आसमानों के नीचे हैं मुझे दे दिये जायें कि सिर्फ़ अल्लाह की इतनी मअसियत करूं कि मैं च्यूंटी से जौ का एक छिलका छीन लूं, तो कभी भी ऐसा न करूंगा। यह दुनिया तो मेरे नज़दीक उस पत्ती से भी ज़ियादा बे क़दर है जो टिड्डी के मुंह में हो कि जिसे वह चबा रही हो। अली को फ़ना होने वाली नेमतों और मिट जाने वाली लज़्ज़तों से क्या वास्ता? हम अक़्ल के ख़्वाबे ग़फ़लत में पड़ जाने और लग़ज़िशों की बुराईयों से ख़ुदा का दामन में पनाह लेते हैं और उस से मदद के ख़्वास्त गार हैं।

 

ख़ुतबा- 222

ख़ुदाया, मेरी आबरू को ग़िना व तवंगरी के साथ महफ़ूज़ रख, और फ़क़रो तंग दस्ती से मेरी मंज़िलत को नज़रों से न गिरा। कि तुझ से रिज़्क़ मांगने वालों से रिज़्क़ मांगने लगूं, और तेरे बंदों की निगाहे लुत्फ़ व करम को अपनी तरफ़ मोड़ने की तमन्ना करूं, और जो मुझे दे उस की मदह व सना करने लगूं, और जो न दे उस की बुराई करने में मुब्लता हो जाऊं, और इन सब चीज़ों के पसे पर्दा तू ही अता करने और रोक लेने का इख़्तियार रखता है, बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है।

 

ख़ुतबा-223

(यह दुनिया) एक ऐसा घर है दो बलाओं में घिरा हुआ और फ़रेब कारियों में शोहरत याफ़्ता है। इस के हालात कभी यकसां नही रहते, और न इस में फ़रोकश होने (निवास करने) वाले सहीह व सालिम रह सकते हैं। इस के हालात मुख़्तलिफ़ और अतवार बदलने वाले हैं। ख़ुश गुज़रानी की सूरत इस में क़ाबिल मज़म्मत और अम्नो सलामती का इस में पता नहीं। इस के रहने वाले तीर अंदाज़ी के ऐसे निशाने हैं कि जिन पर दुनिया अपने तीर चलाती रहती है और मौत के ज़रिये उन्हे फ़ना करती रहती है।

ऐ ख़ुदा के बंदों, इस बात को जाने रहो कि तुम्हे और दुनिया की उन चीज़ों को जिन में तुम हो उन्ही लोगों की राह पर गुज़रना है जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं, कि जो तुम से ज़्यादा लंबी उम्रों वाले, तुम से ज़्यादा आबाद घरों वाले, और तुम से ज़्यादा पायदार निशानियों वाले थे, उन की आवाज़ें ख़ामोश हो गईं, बंधी हवायें उखड़ गई, बदन सड़ गल गये, घर सुनसान हो गये, और नाम व निशान तक मिट गये। उन्हो ने मज़बूत महलों और बिछी हुई मसनदों को पत्थरों और चुनी हुई सिलों और बैवन्दे ज़मीन होने वाली (और) लहद वाली क़ब्रों में बदल लिया, कि जिन के सहनों की बुनियाद तबाही व वीरानी पर है, और मिट्टी से ही उन की इमारतें मज़बूत की गई हैं। उन क़ब्रों की जगह आपस में नज़दीक नज़दीक हैं और उन में बसने वाले दूर उफ़्तादा मुसाफ़िर हैं, ऐसे मक़ाम में कि जहां वह बौखलाए हुए हैं, और ऐसी जगहों में कि जहां दुनिया के कामों से फ़ारिग़ हो कर आख़िरत की फ़िक्रों में की हमसायगी और घरों के क़ुर्ब के बा वजूद हमसायों की तरह आपस में मेल मिलाप नही रखते। और क्यों कर आपस में मिलना जुलना हो सकता है जब कि बोसिदगी व तबाही ने अपने सीने से उन्हे पेश कर डाला है। और पत्छरों और मिट्टी ने उन्हे खा लिया है। तुम भी यही समझो कि (गोया) वहीं पहुच गये जहां वह पहुच चुके हैं और इसी ख़्वाब गाह (क़ब्र) ने तुम्हे भी जकड़ लिया है और इसी अमानत गाह (लहद) ने तुम्हे भी चिमटा लिया है। उस वक़्त तुम्हारी हालत क्या होगी कि जब तुम्हारे सारे मरहले इंतेहा को पहुच जायेंगे और क़ब्रों से निकल खड़े होंगे। वहां हर शख़्स अपने अअमाल के (नफ़आ व नुक़सान) की जांच करेगा, और वह अपने सच्चे मालिक ख़ुदा की तरफ़ पलटाये जायेंगे और जो कुछ इफ़तरा पर्दाज़ियां करते थे उन के काम न आयेंगी।

 

ख़ुतबा-224

ऐ अल्लाह, तू अपने दोस्तों के साथ तमाम उन्स रखने वालों से ज़ियादा मानूस है, और जो तुझ पर भरोसा रखने वाले हैं उन की हाजत रवाई कि लिये हमा वक़्त पेश पेश हैं। तू उन बातिनी कैफ़ियतों को देखता और उन के छिपे हुए भेदों को जानता है और उन की बसीरतों की रसाई से बा ख़बर है। उन के राज़ तेरे सामने आशकारा और उन के दिल तेरे लिये फ़रियादी है। अगर तंहाई से उन का जी घबराता है तो तेरा ज़िक्र उन का दिल बहलाता है। अगर मुसीबतें उन पर पड़ती हैं तो वह तेरे दामन में पनाह लेने के लिये मुल्तजी होते हैं, यह जानते हुए कि सब चीज़ों की बागडोर तेरे हाथ में है और उन के निफ़ाज़ पज़ीर होने की जगहें तेरे ही फ़ैसलों से वाबस्ता हैं।

ख़ुदाया, अगर मैं सवाल करने से आजिज़ रहूं, या अपने मक़सूद पर नज़र न डाल सकूं, तो तू मेरी सहूलतों की तरफ़ रहनुमाई फ़रमा, और मेरे दिल को इस्लाह व बहबूदी की सहीह मंज़िल पर पहुचा। यह चीज़ तेरी रहनुमाइयों और हाजत रवाइयों को देखते हुए की निराली नही।

ख़ुदाया, मेरा मुआमला अपने अफ़्व व बख़्शिश से तय कर न कि अपने अदल व इंसाफ़ के मेयार से।

 

ख़ुतबा-225

फ़लां शख़्स की कार कर्दगीयों की जज़ा अल्लाह दे, उन्हो ने टेढ़ेपन को सीधा किया, मरज़ का चारा किया, फ़ितना व फ़साद को पीछे छोड़ गये, सुन्नत को क़ाइम किया, साफ़ सुथरे दामन और कम ऐबो के साथ दुनिया से रुख़सत हुए। (दुनिया की) भलाइयों को पा लिया और उस की शर अंगेज़ियों से आगे बढ़ गये। अल्लाह की इबादत भी की और उस का पूरा पूरा ख़ौफ़ भी खाया। ख़ुद चले गये और लोगों को ऐसे मुतफ़र्रिक़ रास्तों में छोड़ गये जिन में गुम कर्दा राहे रास्त नही पा सकता और हिदायत याफ़्ता यक़ीन तक नही पहुच सकता।

इब्ने अबिल हदीद ने तहरीर किया है कि लफ़्ज़े फ़लां किनाया (व्यंजना) है हज़रत उमर ने और यह कलेमात उन्ही की मदह व तौसीफ़ में कहे गये हैं। जैसा कि सैयिद रज़ी के तहरीर कर्दा नुस्ख़ ए नहजुल बलाग़ा में लफ़्ज़े फ़लां के नीचे उन्ही के हाथ का लिखा हुआ लफ़्ज़े उमर मौजूद था। यह है कि इब्ने अबिल हदीद का दअवा... मगर देखना यह है कि अगर सैयिद रज़ी ने बतौरे तशरीह हज़रत उमर का नाम लिखा होगा तो जिस तरह उन के दूसरे तशरीहात मौजूद हैं। इस तशरीह को भी मौजूद होना चाहिये और उन नुस्ख़ों में इस का वुजूद होना चाहिये था, कि जो उन के नुस्ख़े से नक़्ल होते रहे हैं। चुनांचे अब भी मूसल में मोतसिम बिल्लाह के दौर के शोहर ए आफ़ाक़ ख़त्तात याक़ूत अल मुस्तअसिमी के हाथ का लिखा हुआ क़दीम तरीन नहजुल बलाग़ा का नुस्ख़ा मौजूद है। मगर सैयिद रज़ी की इस तशरीह (व्याख्या) की निशान दही किसी ने भी नही की, और अगर इब्ने अबिल हदीद की इस रिवायत को सही भी मान लिया जाये तो उसे ज़्यादा से ज़्यादा सैयिद रज़ी की ज़ाती राय (व्यक्ति गत विचार) कहा जा सकता है जिसे किसी क़वी दलील (मज़बूत तर्क) की मौजूदगी में बतौरे मुवैयिद (समर्थन स्वरुप) तो पेश किया जा सकता है, मगर मुस्तक़िल्लन इस शख़्सी राय (व्यक्ति गत विचार) को कोई अहमियत (महत्व) नही दी जा सकती।

हैरकत (आश्चर्य) है कि इब्ने अबिल हदीद सांतवी हिजरी में सैयिद रज़ी के ढाई सौ साल बाद यह इफ़ादा फ़रमाते हैं (लाभ उठाते हैं) कि इस से हज़रत उमर मुराद हैं और यह कि सैयिद रज़ी ने ख़ुद इस की तसरीह (स्पष्ट) कर दी थी, चुनांचे उन के ततब्बो (अनुसरण) में बाज़ दूसरे शारेहीन (भाष्य कर्ताओं, टीका कारों) ने भी यही लिखना शुरु कर दिया। लेकिन सैयिद रज़ी के मुआसेरीन (समकालीन) में से जिन लोगों ने भी नहजुल बलाग़ा के मुतअल्लिक़ कुछ लिखा है उन की तहरीरात में इस का कुछ पता नही चलता। हालांकि ब हैसियते मुआसिर (समकालीन) होने के सैयदि रज़ी की तहरीर पर उन्हे ज़्यादा मुत्तलअ होना चाहिये था। चुनाचे अल्लामा अली बिन नासिर जो सैयिद रज़ी के हम अस्र (समकालीन) थे और उन्ही के दौर में नहजुल बलाग़ा की शरह (टीका) ऐलामे नहजुल बलाग़ा के नाम से लिखते हैं वह इस ख़ुतबे के ज़ैल में तहरीर फ़रमाते हैं कि

हज़रत ने अपने असहाब में से एक ऐसे शख़्स को हुस्ने सीरत के साथ सराहा है कि जो पैग़म्बर (स) के बाद पैदा होने वाले फ़ितने से पहले ही इंतेक़ाल कर चुका था।

इस की ताईद अल्लामा क़ुतुबुद्दीन रावंदी मुतवफ़्फ़ी 573 हिजरी क़मरी शरहे नहजुल बलाग़ा से भी होती है। चुनांचे इब्ने मीसम ने उन का यह क़ौल नक़्ल किया है:

हज़रत ने इस से ज़मान ए पैग़म्बर (स) के अपने एक ऐसे साथी को मुराद लिया है जो फ़ितने के बरपा होने और फैलने से पहले ही रेहलत कर चुका था।

अगर यह कलेमात हज़रत उमर के मुतअल्लिक़ होते, और इस के मुतअल्लिक़ कोई क़ाबिल ऐतेमाद सनद होती तो इब्ने अबिल हदीद उस सनद व रिवायत को दर्ज करते, और उस का ज़िक्र तारीख़ में आता, और ज़बानों पर उस का चर्चा होता, मगर यहां तो इस्बाते मुद्दआ के लिये ख़ुद साख़्ता क़राइन के अलावा कुछ नज़र ही नही आता। चुनांचे वह ख़ैरुहा व शर्रुहा की ज़मीर मरज ए ख़िलाफ़त को क़रार देते हुए लिखते हैं कि यह कलेमात ऐसे ही शख़्स पर सादिक़ आ सकते हैं जो तसल्लुत व इक़्तेदार रखता हो, क्यों कि इक़्तेदार के बग़ैर ना मुम्किन है कि सुन्नत की तरवीज और बिदअत की रोक थाम की जा सके। यह है उस दलील का ख़ुलासा (सारांश) जिसे इस मक़ाम पर पेश किया है, हालांकि इस की कोई दलील नही कीं इस की ज़मीर मरज ए ख़िलाफ़त है। बल्कि वह ज़मीर दुनिया की तरफ़ राजे हो सकती है। जो सियाक़े कलाम से मुस्तफ़ाद है और मफ़ादे आम्मा की हिफ़ाज़त और तरवीजे सुन्नत के लिये इक़्तेदार की शर्त लगा देना अम्र बिल मारुफ़ और नही अनिल मुन्कर का दरवाज़ा बंद कर देना है। हालां कि ख़ुदा वंदे आलम ने शर्ते इक़्तेदार के बग़ैर उम्मत के एक गिरोह पर यह फ़रीज़ा आइद किया है:

तुम में से एक ऐसा गिरोह होना चाहिये कि नेकी की तरफ़ बुलाएं और अच्छे कामों का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके।

इसी तरह पैग़म्बर (स) से मरवी है कि

लोग जब तक अम्र बिल मारुफ़ और नहीं अनिल मुन्कर करते रहेगें और नेकी और तक़वा पर एक दूसरे का हाथ बटाते रहेंगे वह भलाई पर बाक़ी रहेंगे।

यूं ही अमीरुल मोमिनीन (अ) अपने एक वसीयत में उमूमीयत के साथ फ़रमाते है:

तौहीद और सुन्नत के सुतूनों को क़ायम करो और इन दोनों चिराग़ों को रौशन रखो।

इन इरशादात में कहीं भी इस तरफ़ इशारा नहीं कि इस फ़रीज़े की अंजाम दही हुकूमत व इक़्तेदार के बग़ैर नही हो सकती और वाक़ेयात भी यह बताते हैं कि उमरा व सलातीने लश्कर व सिपाह और क़ुव्वत व ताक़त के बावजूद बुराईयों को इस हद न मिटा सके और नेकियों को इस क़दर रिवाज न दे सके। जिस क़दर गुमनाम शिकस्ता हाल दरवेश अख़लाक़ी रिफ़अतों को उभार गए। हालां कि उन की पुश्त पर न फ़ौज न सिपाह होती थी और बे सरो सामानी के अलावा कोई सरो सामान होता था। कि बेशतर इस्लामी ताजदारों ने इस्लामी ख़दो खाल को मिटा कर रख दिया, और इस्लाम अपने बक़ा ए फ़रोग़ में सिर्फ़ उन बे नवाओं के मरहूने मिन्नत रहा जिन की झोली में फ़क़्र व ना मुरादी के अलावा कुछ न होता था।

अगर इसी पर इसरार हो कि इस से सिर्फ़ एक हुक्म रान ही मुराद लिया जा सकता है तो क्यों न इस से हज़रत को कोई ऐसा साथी मुराद लिया जाये जो किसी सूबे पर हुक्म रान रह चुका हो, जैसे हज़रत सलमाने फ़ारसी, जिन की तजहीज़ व तकफ़ीन के लिये हज़रत मदाइन तशरीफ़ ले गये, और आइने हुक्मरानी पर तबसिरा करते हुए यह अल्फ़ाज़ इरशाद फ़रमाएं हों, फिर यह समझना कि वह हज़रत उमर ही के लिये अल्फ़ाज़ हैं बिला दलील ही तो है। आख़िर में इस्बाते मुद्दआ के लिये तबरी की एक रिवायत को पेश किया है:

मुग़ीरा बिन शोअबा से रिवायत है कि जब हज़रत उमर इंतेक़ाल कर गए तो बिन्ते अबी हसमा ने रोते हुए कहा कि हाय, उमर तो वह था जिस ने टेढ़े पन को सीधा किया, बीमारियों को दूर किया, फ़ितनों को मिटाया और सुन्नतों को ज़िन्दा किया, पाकीज़ा दामन और ऐबों से बच कर चल बसा। (मुवर्रिख़ तबरी कहते हैं कि) मुग़ीरा ने बयान किया कि जब हज़रत उमर दफ़्न हो गये तो मैं हज़रत अली (अ0) के पास आया और चाहता था कि आप से हज़रत उमर के बारे में कुछ सुनूं। चुनांचे मेरे जाने पर हज़रत बाहर तशरीफ़ लाए इस हालत में कि आप ग़ुस्ल फ़रमा कर एक कपड़े में लिपटे हुए थे और सर और डाढ़ा के बालों को झटक रहे थे और आप को इस अम्र में कोई शुबहा न था कि ख़िलाफ़त आप ही की तरफ़ पलटेगी। इस मौक़े पर आप ने फ़रमाया, ख़ुदा इब्ने ख़त्ताब पर रहम करे बिन्ते अबही हसमा ने सच कहा है कि वह ख़िलाफ़त के फ़ायदे उठा गए और बाद में पैदा होने वाले फ़ितनों से बच निकले। ख़ुदा की क़सम, बिन्ते अबी हसमा ने कहा नहीं बल्कि उस से कहलवाया गया है। (तबरी ज़िल्द 3 पेज 285)

इस वाक़िये का रावी मुग़ीरा बिन शोअबा है जिस का उम्मे जमील के साथ फ़ेले बद का मुरतकिब होना, और शहादत के बावजूद हज़रत का उसे हद से बचा ले जाना, और मुआविया के हुक्म से उस का कूफ़े में अलानिया अमीरुल मोमिनीन (अ) पर सब्ब व शत्म करना, तारीख़ी मुसल्लमात में से है। मुग़ीरा का यह कहना कि अमीरुल मोमिनीन (अ) को अपनी ख़िलाफ़त में कोई शुबहा न था, हक़ीक़त के ख़िलाफ़ है। आख़िर वह कौन से क़राइन थे जिन से उस ने यह अंदाज़ा लगाया? जब कि तारीख़ी हक़ायक़ इस के सरासर ख़िलाफ़ है, और किसी की ख़िलाफ़त यक़ीनी थी तो वह हज़रत उस्मान थे। चुनांचे अब्दुर रहमान इब्ने औफ़ ने शूरा के मौक़े पर अमीरुल मोमिनीन (अ) से कहा कि:

ऐ अली (अ), तुम अपने लिये ज़रर की सूरत पैदा न करो। मैं ने देख भाल लिया है और लोगों से मशविरा भी लिया है। वह सब उस्मान को चाहते हैं।

चुनांचे हज़रत को ख़िलाफ़त न मिलने का पूरा यक़ीन था, जैसा कि ख़ुतब ए शिक़शिक़यह के ज़ैल में तारीख़े तबरी से नक़्ल किया जा चुका है कि अमीरुल मोमिनीन (अ) ने अरकाने शूरा के नाम देखते ही अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब से फ़रमा दिया था कि ख़िलाफ़त उस्मान के अलावा किसी और को नही मिल सकती क्यों कि तमाम इख़्तियारात अब्दुर रहमान को सौंप दिये गये हैं और वह उस्मान के बहनोई होते हैं और सअद बिन अबी वक़ास, अब्दुर रहमान के अज़ीज़ व हम क़बीला है और यह दोनों मिल कर ख़िलाफ़त उन्ही को देगें।

इस मौक़े पर सवाल यह पैदा होता है कि वह कौन सा जज़्बा था जिस ने मुग़ीरा के दिल में यह तड़प पैदा कर दी कि वह हज़त उमर के मुतअल्लिक़ अमीरुल मोमिनीन (अ) से कुछ कहलवाये। अगर वह यह जानता था कि हज़रत उन के मुतअल्लिक़ अच्छे ख़्यालात रखते हैं तो उन के तअस्सुरात का भी अंदाज़ा हो सकता था, और अगर यह समझता था कि अमीरुल मोमिनीन (अ0) उन के मुतअल्लिक़ हुस्ने ज़न नही रखते तो पूछने का मक़सद इस के अलावा कुछ नही हो सकता कि आप जो कुछ फ़रमायें उसे उछाल कर फ़ज़ा को उन के ख़िलाफ़ और अरकाने शूरा को उन से बद ज़न किया जाये, और अरकाने शूरा के नज़रियात तो इसी से ज़ाहिर हैं कि वह इंतेख़ाबे ख़िलाफ़त में सीरते शैख़ैन की पाबंदी लगा कर शैखैन से अपनी अक़ीदत का मुज़ाहिरा करते हैं। इन हालात में जब मुग़ीरा ने यह साज़िश करना चाही तो आप ने हिकायते वाक़ेया के तौर पर फ़रमाया लक़द ज़हबा बे ख़ैरेहा व नजा मिन शर्रेहा। इस जुमले को मदह व तौसीफ़ से कोई लगाव नही। यक़ीनन वह अपने दौर में हर तरह के फ़ायदे उठाते रहे और बाद में पैदा होने वाले फ़ितनों से उन का दौर ख़ाली रहा। इब्ने अबिल हदीद इस रिवायत को दर्ज करने के बाद लिखते हैं कि:

इस रिवायत से यह ज़न क़वी हो जाता है कि इस कलाम से मुराद व मक़सूद हज़रत उमर बिन ख़त्ताब हैं। 

अगर इस कलाम से मुराद वह कलेमात हैं जो बिन्ते अबी हसमा ने कहे हैं कि जिन के मुतअल्लिक़ अमीरुल मोमिनीन (अ) ने फ़रमाया कि यह उस दिल की आवाज़ नहीं बल्कि उस से कहलवाये गये हैं। तो बेशक इस से मुराद हज़रत उमर हैं। लेकिन यह कि यह अल्फ़ाज़ अमीरुल मोमिनीन (अ) ने उन की मदह में कहें हैं तो यह कहीं साबित नही होता बल्कि इस रिवायत से तो सराहतन यह साबित होता है कि यह अल्फ़ाज़ बिन्ते अबी हसमा ने कहे थे, ख़ुदा जाने कि किस बेना पर बिन्ते अबी हसमा के अल्फ़ाज़ को दर्ज कर के यह दावा करने की जुरअत की जाती है कि यह अल्फ़ाज़ अमीरुल मोमिनीन (अ) ने हज़रत उमर के बारे में कहे हैं। ब ज़ाहिर यह मालूम होता है कि अमीरुल मोमिनीन (अ) ने किसी मौक़े पर यह अल्फ़ाज़ किसी के मुतअल्लिक़ कहे होंगे, और बिन्ते अबी हसमा ने हज़रत उमर के इंतेक़ाल पर उन से मिलते जुलते हुए अल्फ़ाज़ किसी के मुतअल्लिक़ कहे तो हज़रत अली (अ) के कलेमात को भी हज़रत उमर की मदह में समझ लिया गया। वर्ना अक़्ले एतेज़ाल के अलावा कोई अक़्ल यह तजवीज़ नही कर सकती कि बिन्ते अबी हसमा के कहे हुए अल्फ़ाज़ को इस की दलील क़रार दिया जाये कि अमीरुल मोमिनीन (अ) ने हज़रत उमर की मदह में यह अल्फ़ाज़ फ़रमाए हैं। क्या ख़ुतब ए शिक़शिक़ियह के तसरीहात के बाद यह तवक़्क़ों की जा सकती है कि अमीरुल मोमिनीन (अ) ने ऐसे अल्फ़ाज़ कहे होंगे। और फिर ग़ौर तलब बात यह है कि अगर यह अल्फ़ाज़ हज़रत उमर की रेहलत के मौक़े पर फ़रमाए होते तो जब आप शूरा के मौक़े पर अलानिया सीरते शैख़ैन को तस्लीम करने से इंकार कर देते हैं तो आप से यह नही कहा जाता कि कल तो आप यह फ़रमा रहे थे कि उन्हो ने सुन्नत को क़ाइम किया और बिदअत को मिटाया तो जब उन की सीरत सुन्नत से हम नवा है तो फिर सुन्नत को तस्लीम करने के बाद सीरत से इंकार करने के क्या मअनी होते हैं।

 

ख़ुतबा- 226

आप की बैअत ते बयान में ऐसा ही एक ख़ुतबा इस से क़ब्ल इस के कुछ मुख़्तलिफ़ लफ़्ज़ों में गुज़र चुका है।

तुम ने (बैअत के लिये) मेरा हाथ (अपनी तरफ़) फैलाना चाहा तो मैं ने उसे रोका, और तुम ने खींचा तो मैं उसे समेटता रहा। मगर तुम मे मुझ पर इस तरह हुजूम किया जिस तरह प्यासे उंट पानी पीने के लिये तालाब पर टूटते हैं। यहां तक कि जूती (के तस्मे) टूट गये और मेरी बैअत पर लोगों की मसर्रत यहां तक पहुत गई कि छोटे छोटे बच्चे ख़ुशियां मनाने लगे, और बूढ़े लड़खड़ाते हुए क़दमों से बैअत के लिये बढ़े। बीमार भी उठते बैठते हुए पहुच गये और नव जवान लड़कियां पर्दों से निकल कर दौड़ पड़ी।

 

ख़ुतबा- 227

बेशक अल्लाह का ख़ौफ़ (भय) हिदायत (अनुदेश) की किलीद (कुंजी) और आख़िरत (परलोक) का ज़ख़ीरा (भंडार) है। (ख़्वाहिशों-इच्छाओं, की) हर ग़ुलामी से आज़ादी और हर तबाही से रिहाई का बाइस है। इस के ज़रिये तलबगार मंज़िले मक़सूद (वांछित गंतव्य) तक पहुंचता और (सख़्तियों से) भागने वाला निजात (मुक्ति) पाता है, और मतलूबा (वांछित) चीज़ों तक पहुच जाता है। (अच्छे) अअमाल बजा लाओं, अभी जब कि अअमाल बुलंद हो रहे हैं तो यह फ़ायदा दे सकती हैं। पुकार सुनी जा रही है। हालात पुर सुकून और (केरामन कातिबीन के) क़लम रवां हैं। ज़ोफ़ व पीरी (निर्बलता व वृद्धावस्था) की तरफ़ पलटाने वाली उम्र (आयु) ज़ंज़ीरे पा बन जाने वाले मरज़ और झपट लेने वाली मौत से पहले अअमाल की तरफ़ जल्दी करो, क्यों कि मौत तुम्हारी लज़्ज़तों को तबाह करने वाली, ख़्वाहिशात (इच्छाओं) को मुक़द्दर बनाने वाली, और तुम्हारी मंज़िलों को दूर कर देने वाली है। यह ना पसंदीदा मुलाक़ाती और शिकस्त न खाने वाला हरीफ़ (प्रतिद्धन्द्धी) है, और ऐसी ख़ूख़ार है कि उस से (ख़ूं बहा) का मुतालबा नहीं किया जा सकता। उस के फंदे तुम्हे जकड़े हुए हैं, और उस की तबाह कारियां तुम्हे घेरे हुए हैं, और उस के (तीरों के) फल तुम्हे सीधा निशाना बनाए हुए हैं, और तुम पर उस का ग़लबा व तसल्लुत (विज एवं आधिपत्य) अज़ीम (महान) और तुम पर उस का ज़ुल्म व तअद्दी बराबर जारी है, और उस के वार के ख़ाली जाने का इम्कान कम है। क़रीब है कि सहाबे मर्ग की तीरगियां, मरज़ुल मौत के लूके जान लेवा सख़्तियों के अंधेरे, सांस उखड़ने की मदहोशियां, जांकनी की अज़ीयतें, उस के हर तरफ़ से छा जाने की की तारीकी, और कामो दहन के लिये उस की बद मज़गी तुम्हे घेर ले, गोया कि वह तुम पर अचानक आ पड़ी है कि जिस ने तुम्हारे साथ चुपके चुपके बातें करने वाले को ख़ामोश कर दिया, और तुम्हारे निशानात को मिटा दिया और तुम्हारे घरों को सुनसान कर दिया। और तुम्हारे वारिसों को तैयार कर दिया कि वह तुम्हारे तरके को मख्सूस अज़ीज़ों में, कि जिन्होने तुम्हे कुछ भी फ़ायदा न दिया। और उन ग़म ज़दा क़रीबियों में, कि जो (मौत को) रोक न सके, और उन ख़ुश होने वाले (रिश्तेदारों) में जो ज़रा बेचैन नही हुए, तक़सीम कर लें। लिहाज़ा तुम्हे लाज़िम है कि तुम सई व कोशिश करो, और (सफ़रे आख़िरत के लिये) तैयार हो जाओं, और सरो सामान मुहैया करो, और ज़ाद मुहैया कर लेने वाली मंज़िल से ज़ाद फ़राहम कर लो। दुनिया तुम्हे फ़रेब न दे। जिस तरह से तुम से, पहले गुज़र जाने वाली उम्मतों और गुज़श्ता लोगों को फ़रेब दिया कि जिन्होने इस दुनिया का दूध दुहा और उस की ग़फ़लत से फ़ायदा उठा ले गये, और उस के गिने चुने (दिनों को) फ़ना और ताज़गियों को पज़मुर्दा कर दिया, उन के घरों ने क़ब्रों की सूरत इख़्तियार कर ली। उन का माल तरका बन गया। जो उन की क़ब्रों पर आता है उसे पहचानते नही, जो उन्हे रोता है उस की परवाह नही करते, और जो पुकारे उसे जवाब नही देते। इस दुनिया से डरो कि यह ग़द्दार धोके बाज़ और फ़रेब कार है। देने वाली और फिर ले लेने वाली है। लिबास पहनाने वाली और फिर उतरवा लेने वाली है। इस की आसाइशें हमेशा नही रहतीं, न इस की सख़्तियां ख़त्म होती हैं और न इस की मुसीबतें थमती हैं।

इस ख़ुतबे का यह हिस्सा ज़ाहिदों के औसाफ़ में हैं।

वह ऐसे लोग थे जो अहले दुनिया में से थे मगर (हक़ीक़तन) दुनिया वाले न थे। वह दुनिया में इस तरह रहे कि गोया दुनिया से न हो। उन का अमल उन चीज़ों पर है जिन्हे ख़ूब पहचाने हुए हैं। और जिस चीज़ से ख़ाइफ़ (भयभीत) हैं उस से बचने के लिये जल्दी करते हैं। उन के जिस्म गोया अहले आख़िरत के मजमे में गर्दिश कर रहे हैं। वह अहले दुनिया को देखते हैं कि वह उन की जिस्मानी मौत को बड़ी अहमियत देते हैं और वह उन अशख़ास के हाल को ज़ियादा अंदोह नाक समझते हैं जो ज़िन्दा हैं मगर उन के दिल मुर्दा हैं।

 

ख़ुतबा-228

अमीरुल मोमिनीन (अ) ने बसरे की तरफ़ जाते हुए मक़ामे ज़ीक़ार में यह ख़ुतबा इरशाद फ़रमाया, इस का वाक़िदी ने किताबुल जमल में ज़िक्र किया है।

रसूल (स) को जो हुक्म हुआ था उसे आप ने खोल कर बयान कर दिया और अल्लाह के पैग़ामात पहुचा दिये। अल्लाह ने आप के ज़रिये बिखरे हुए अफ़राद की शीराज़ा बंदी की। सीनों में भरी हुई सख़्त अदावतों और दिलों में भड़क उठने वाले कीनों के बाद ख़ीश व अक़ारिब (अपने एवं अन्य सगे संबंधियों) को आपस में शीर व शकर कर दिया।

 

ख़ुतबा- 229

अब्दुल्लाह बिन ज़मआ जो आप की जमाअत में महसूब होता था आप के ज़मान ए ख़िलाफ़त में कुछ माल तलब करने के लिये हज़रत के पास आया तो आप ने इरशाद फ़रमाया।

यह माल न मेरा है न तुम्हारा बल्कि मुसलमानों का हक़्क़े मुशतरक, और उन की तलवारों का जमअ किया सरमाया है। अगर तुम उन के साथ जंग में शरीक हुए होते तो तुम्हारा हिस्सा भी उनके बराबर होता, वर्ना उन के हाथों की कमाई दूसरों के मुंह का निवाला बनने के लिये नही है।

 

ख़ुतबा-230

मअलूम होना चाहिये कि ज़बान इंसान (के बदन का) एक टुकड़ा है। जब इंसान (का ज़ेहन) रुक जाये तो फिर कलाम (वचन) उन का साथ नही दिया करता, और जब उस के (मालूमात में) वुसअत हो तो फिर कलाम ज़बान को रुकने की मोहलत नही दिया करता। और हम (अहलेबैत) इक़लीमे सुख़न के फ़रमां रवा (वचन रूपी महाद्धीप के शासक) हैं। वह हमारे रग व पय में समाया हुआ है और उस की शाख़े हम पर झुकी हुई हैं।

ख़ुदा तुम पर रहम करे, इस बात को जान लो कि तुम ऐसे दौर में हो, जिस में हक़ गो (सत्यवान) कम, ज़बाने सिद्क़ बयानी (सत्य बोलने) के कुन्द, और हक़ (सत्य) वाले ज़लीलों ख़्वार (अपमानित एवं तुच्छ) हैं। यह लोग गुनाहों ना फ़रमानी (पाप एवं अवज्ञा) पर जमे हुए हैं और ज़ाहिर दारी व निफ़ाक़ (पाखंड) की बिना पर एक दूसरे से सुल्ह व सफ़ाई रखते हैं। इन के जवान बद खू (दुष्ट युवक), इन के बूढ़े गुनहगार, इन के आलिम मुनाफ़िक़ (ज्ञानी कपटी एवं पाखंडी) और इन के वाइज़ (उप देशक) चापलूस हैं। न छोटे बड़ों की तअज़ीम (सम्मान) करते हैं और न मालदार फ़क़ीर व बेनवा की दस्तगीरी करते हैं।

अमीरुल मोमिनीन (अ) ने एक मौक़े पर अपने भांजे जोअदा इब्ने हुबैर ए मख़ज़ूमी से फ़रमाया कि वह ख़ुतबा दें मगर जब ख़ुतबा देने के लिये खड़े हुए ज़बान लड़खड़ाने लगी और कुछ न कह सके। जिस पर हज़रत ख़ुतबा देने के लिये मिम्बर पर बुलंद हुए और एक तवील ख़ुतबा इरशाद फ़रमाया जिस के चंद जुमले सैयिद रज़ी ने यहां दर्ज किये है।

 

ख़ुतबा- 231

ज़ेलबी यमानी ने इबने क़ुतैबा से, और उस ने अब्दुल्लाह इब्ने यज़ीद से उन्हो ने मालिक इब्ने देहया से रिवायत की है कि उन्हो ने कहा कि हम अमीरुल मोमिनीन (अ0 की ख़िदमत में हाज़िर थे कि लोगों के इख़्तिलाफ़े सूरतों सीरत का ज़िक्र छिड़ा, तो आप ने फ़रमाया।

उन के मब्द ए तीनत (रचयता) ने उन में तहरीफ़ (भिन्नता) पैदा कर दी है, और यह इस तरह कि वह शोरा ज़ार व शीरीं ज़मीन और सख़्त व नर्म मिटटी से पैदा हुए हैं। लिहाज़ा वह ज़मीन के क़ुर्ब (निकटता) के ऐतेबार से मुत्तफ़िक़ (संगठित) होते और इख़्तिलाफ़ के तनासुब (अनुपात) से मुख़्तलिफ़ (भिन्न) होते हैं। (इस पर कभी ऐसा होता है।) कि पूरा ख़ुश शक़्ल इंसान (सरुप मनुष्य) अक़्ल में नाक़िस (बुद्धि में अपूर्ण) और बुलंद क़ामत आदमी पस्त हिम्मत हो जाता है। और नेकू कार (शुभ कर्मी), बद सूरत (कुरुप) और कोताह क़ामत (नाटा आदमी) दूर अंदेश (दूर दर्शी) होता है, और तबअन (स्वभाव में) में सरिश्त (सद व्यवहारी) किसी बुरी आदत को पीछे लगा लेता है, और परीशान दिल वाला परा गंदा अक़्ल और चलती हुई ज़बान वाला होश मंद दिल रखता है।

हज़रत ने इस कलाम में इंसानी सूरतों सीरत के इख़्तिलाफ़ का सबब इंसान के मबादिये तीनत को क़रार दिया है कि जिन के मुताबिक़ उन के ख़दो ख़ाल बनते और सीरतो किरदार के सांचे ढलते हैं। चुनांचे इंसानों के मबादिये तीनत में जितना क़ुर्ब होगा उतना ही उन के ज़ेहनी व फ़िकरी रुजाहानात हम आहंग होंगे, और जितना उन में बोअद होगा, उतना ही उन के अमयाल व अवातिफ़ में इख़्तिलाफ़ उभरेगा। मवादी शय से मुराद वह चीज़ें होती हैं कि जिन पर उस के वुजूद का इनहिसार हो, मगर वह उस के लिये इल्लत न हों, और तीन तीनत की जमअ है कि जिस के मअनी अस्ल व बुनियाद के होते हैं और यहां पर तीनत से मुराद नुतफ़ा है, कि नशवो नुमा की मुख़्तलिफ़ मंज़िलों से गुज़र कर इंसानी सूरत में रुनुमा होता है। और उस के मबादी से मुराद वह अजज़ा ए उनसुरीयह की तरफ़ इशारा किया है और यह अजज़ा चूं कि मुख़्तलिफ़ कैफ़ियात के हामिल होते हैं लिहाज़ा उन से पैदा होने वाली मख़लूक़ के इख़्तिलाफ़े सोवर व अख़लाक़ से होता है।

इब्ने अबिल हदीद ने तहरीर किया है कि मबादिये तीनत के मुराद नुफ़ूसे मुदब्बिरह है, जो कि अपनी माहीयात में मुख़्तलिफ़ होते हैं जैसे कि अफ़लातून और होकमा की एक जमाअत का मसलक है। और उन्हे मवादिये तीनत से तअबीर करने की वजह यह है कि यह जिस्मे इंसानी के लिये हिसार और अनासिर के मुतफ़र्रिक़ व पाशां होने से माने होते हैं। तो जिस तरह शय का वुजूद उस के मबादी पर मुनहसिर होता है उसी तरह से जसदे उनसुरी की बक़ा नफ़्से मुदब्बिरह पर मुन्हसिर है। चुनाचे जब तक नफ़्से मुदब्बिरह बाक़ी रहता है बदन शिकस्त व रेख़्त से और अनासिर मुन्तशिर व पराकंदा होने से महफ़ूज़ रहते हैं। और जब वह बदन का साथ छोड़ देता है तो फिर अनासिर का शीराज़ा भी बिखर जाता है।

इस तावील की बिना पर हज़रत के इरशाद का मतलब यह होगा कि क़ुदरत ने मुख़्तलिफ़ नुफ़ूस पैदा किये हैं। जिन में से कुछ शक़ी हैं, कुछ सईद और कुछ ज़ईफ़ है और कुछ क़वी और जिस में जैसा नफ़्स कार फ़रमा होगा उस से वैसे ही अफ़आली अअमाल सादिर होंगे और दो शख़्सों के रुजहानात में अगर यकसानियत व हम रंगी होती है तो इस लिये कि उन के नफ़्स यकसां व हम रंग हैं। और अगर उन के मैलानात में फ़र्क़ होता है इस लिये कि उन के नफ़्स आपस में कोई मुनासिबत नही रखते। लेकिन यह तावील क़ाबिले क़बूल नही क्यों कि अमीरुल मोमिनीन (अ) इरशाद में सिर्फ़ सीरतों किरदार के इख़्तिलाफ़ का तज़किरा नही बल्कि सूरत व शक्ल के इख़्तिलाफ़ का भी ज़िक्र है। और सूरतो शक्ल के इख़्तिलाफ़ को नफ़्स के इख़्तिलाफ़ का नतीजा नही क़रार दिया जा सकता।

बहर सूरत इंसानी सूरत व सीरत के इख़्तिलाफ़ की वजह नुफ़ूसे मुदब्बिरह हों या अजज़ा ए उनसुरियह, इन कलेमात से नफ़ीये इख़्तियार और जब्र का तवह्हुम होता है कि अगर इंसान की फ़िकरी व अमली ख़ुसूसीयात तीनत की कार फ़रमाई की वजह से होती है तो अपने को एक मुअय्येना सांचे में ढालने पर मजबूर होगा, कि जिस की वजह से न अच्छी ख़सलत पर तहसीन व आफ़रीन का मुस्तहिक़ क़रार पायेगा, और न बुरी ख़सलत, साबित है कि ख़ुदा वंदे आलम जिस तरह कायनात की हर चीज़ को उस के मौजूद होने से पहले भी जानता था, और उस के इल्म में था कि इंसान अपने इरादा व इख़्तियार से किन चीज़ों पर अमल करेगा और किन चीज़ों को तर्क करेगा तो क़ुदरत ने उस के इख़्तियारी अफ़आल के लिहाज़ से वैसी ही उसे इस्तेदाद दे दी और वैसी ही तीनत से उसे ख़ल्क़ कर दिया, और यह तीनत उन अफ़आल के वुक़ूअ की इल्लत नहीं कि इंसान को मजबूर क़रार दे कर उस से इख़्तियार को सल्ब कर लिया जाये, बल्कि मुनासिब तीनत से ख़ल्क़ करने के मअनी यह हैं कि अल्लाह उस के लिये ब जब्र माने नही होता और जिस राह पर वह बा इख़्तियार ख़ुद चलना चाहता है चलने देता है।

 

ख़ुतबा- 232

(रसूलल्लाह (स) को ग़ुस्ल व कफ़न देते वक़्त फ़रमाया)

या रसूलल्लाह (स) मेरे मां बाप आप पर क़ुर्बान हो। आप के रेहलत फ़रमा जाने से नुबुव्वत, ख़ुदाई अहकाम और आसमानी ख़बरों का सिलसिला क़तअ (विच्छित) हो गया, जो किसी और (नबी) के इंतेक़ाल से क़तअ (खंडित) नही हुआ था। (आपने) इस मुसीबत में अपने अहले बैत को मख़्सूस किया। यहां कर कि आप ने दूसरों के ग़मों से तसल्ली दे दी और (इस ग़म को) आम कर दिया कि सब लोग आप के (सोग में) बराबर के शरीक हैं। अगर आप ने सब्र का हुक्म और नाला व फ़रियाद से रोका न होता तो हम आप के ग़म में आंसूओं का ज़ख़ीरा ख़त्म कर देते, और यह दर्द मिन्नत पज़ीरे दरमां न होता, और यह ग़म व हुज़्न साथ न छोड़ता। (फिर भी यह) गिरया व बुका और अंदोह व हुज़्न आप की मुसीबत के मुक़ाबले में कम होता। लेकिन मौत ऐसी चीज़ है कि जिस की पलटाना इख़्तियार में नहीं है और न इस का दूर करना बस में है। मेरे मां बाप आप पर निसार हों, हमें भी अपने परवरदिगार के पास याद किजियेगा और हमारा ख़्याल रखियेगा।

 

ख़ुतबा-233

इस में पैग़म्बर इस्लाम (स) की हिजरत के बाद अपनी कैफ़ियत और फिर उन तक पहुचने तक ही हालत का तज़किरा है।

मैं रसूलल्लाह (स) के रास्ते पर रवाना हुआ, और आप के ज़िक्र के ख़ुतूत पर क़दम रखता हुआ मक़ामे उरुज तक पहुच गया।

सैयिद रज़ी कहते हैं कि यह टुकड़ा एक तवील कलाम का जुज़ है और ऐसा कलाम है जिस में इंतेहा दर्जे का इख़्तेसार और फ़साहत मल्हूज़ रखी गई है। इस से मुराद यह है कि इब्तेदा ए सफ़र से ले कर यहां तक कि मैं इस मक़ामे उरुज तक पहुचा, बराबर आप की इत्तेलाआत मुझे पहुच रही थीं, आप ने इस मतलब को इस अजीब व ग़रीब किनाये में अदा किया है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) बेसत के बाद तेरह बरस तक मक्के में रहे। यह अर्सा आप की इंतेहाई मज़लूमियत व बे सरो सामानी का था। कुफ़्फ़ारे कुरैश ने आप पर मसायले मईशत के तमाम दरवाज़े बंद कर दिये थे, और ईज़ा रसानी का कोई दक़ीक़ा उठा न रखा था। यहां तक कि आप की जान के दुश्मन हो कर इस फिक्र में लग गये कि किसी तरह से आप का काम तमाम कर दिया जाये। चुनांचे उन के चालीस सर कर्दा अफ़राद दारुन नदवा में सलाह व मशविरा के लिये जमा हुए और यह फ़ैसला किया कि हर क़बीले से एक फ़र्द मुन्तख़ब कर लिया जाये और वह मिल कर आप पर हमला करें। इस तरह बनी हाशिम यह जुरअत न कर सकेगें कि तमाम क़बाइल का मुक़ाबला करें और यह मुआमला ख़ूं बहा पर टल जायेगा। इस क़रार दाद को अमली जामा पहनाने के लिये रबिउल अव्वल की शबे अव्वल को यह लोग पैग़म्बर (स) के घर के क़रीब घात लगा कर बैठ गये कि जब हज़रत (स) बिस्तर पर इस्तेराहत फ़रमायें तो उन पर हमला कर दिया जाये। इधर क़त्ल की तैयारी हो चुकी थी। उधर क़ुदरत ने कुफ़्फ़ारे क़ुरैश की तमाम साज़िशों से आप को आगाह कर दिया और हज़रत अली (अ) को अपने बिस्तर पर सुला कर मदीने की तरफ़ हिजरत कर जाने का हुक्म दिया।

चुनांचे पैग़म्बर (स) ने अली बिन अबी तालिब (अ) को बुला कर उन से अपना इरादा ज़ाहिर किया और फ़रमाया कि ऐ अली, तुम मेरे बिस्तर पर लेट जाओ। अमीरुल मोमिनीन (अ0) ने कहा कि या रसूलल्लाह, क्या मेरे सोने से आप की जान बच जायेगी? फ़रमाया कि हां, यह सुन कर अमीरुल मोमिनीन (अ) सजद ए शुक्र बजा लाये, और सरो तन की बाज़ी लगा कर रसूल (स) के बिस्तर पर लेट गये और पैग़म्बर (स) मकान के अक़बी दरवाज़े से निकल गये। कुफ़्फ़ारे क़ुरैश झांक झांक कर देख रहे थे और हमल के लिये पर तौल रहे थे कि बू लहब ने कहा कि रात के वक़्त हमला करना मुनासिब नही है क्यों कि घर में औरतें और बच्चे हैं, जब सुबह हो तो हमला कर देना और रात भर इन पर कड़ी निगरानी रखो कि इधर उधर न होने पायें। चुनांचे वह रात भर बिस्तर पर नज़रे जमाये रहे और जब पौ फूटी तो दबे पांव आगे बढ़े। अमीरुल मोमिनीन (अ0) ने उन के क़दमों की चाप सुन कर चादर उलट दी और उठ खड़े हुए। कुरैश आंखे आंखें फाड़ फाड़ कर देखने लगे कि यह नज़रों का फेर है या हक़ीक़त है मगर जब यक़ीन हो गया कि यह अली हैं तो पूछा कि मुहम्मद कहं हैं? फ़रमाया क्या मेरे सुपुर्द कर गये थे जो मुझ से पूछते हो। इस का उन के पास कोई जवाब नही था। तआक़ुब में आदमी दौड़े। मगर ग़ारे सौर तक निशाने क़दम मिलता रहा उस के बाद न निशाने क़दम था और न ग़ार में छिपने के कुछ आसार थे, हैरान व सरा सींमा हो कर पलट आये और पैग़म्बर (स) तीन दिन ग़ारे सौर में गुज़ार कर मदीने की तरफ़ चल दिये। अमीरुल मोमिनीन (अ) ने यह तीन दिन मक्के में गुज़ारे, लोगों की अमानतें उन के हवाले कीं, और फिर पैग़म्बर (स) की जुस्तजू में मदीने की तरफ़ रवाना हो गये। मक़ामे उरुज तक जो कि मक्के और मदीने के दरमियान एक बस्ती है, पैग़म्बर (स) का पता उन्हे चलता रहा और उन की तलाश में क़दमें शौक़ उठता रहा। यहां तक कि बारह रबीउल अव्वल को मक़ामें क़ुबा में पैग़म्बर (स) से जा मिले और फिर उन्ही के हमराह मदीने में दाख़िल हुए।

 

ख़ुतबा- 234

अअमाल बजा लाओ, अभी जब कि तुम ज़िन्दगी की फ़राख़ी व वुसअत में हो। अअमाल नामे खुले और तौबा का दामन फैला हुआ है। अल्लाह से रुख़ फेर लेने वाले को पुकारा जा रहा है, और गुनहगारों को उम्मीद दिलाई जा रही है। क़ब्ल इस के कि अमल की रौशनी गुल हो जाये, और मोहलत हाथ से जाती रहे, और मुद्दत ख़त्म हो जाये और तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाये, और मलाइका आसमान पर चढ़ जायें।

चाहियें कि इंसान ख़ुद अपने से अपने वास्ते, और ज़िन्दा से मुर्दा के लिये, और फ़ानी से बाक़ी के लिये, और जाने वाली ज़िन्दगी से हयाते जावेदानी के लिये नफ़अ व बहबूद हासिल करे। वह इंसान जिसे एक मुद्दत तक उम्र दी गई है और अमल की अंजाम दही के लिये मोहलत भी मिली है। उसे अल्लाह से डरना चाहिये। मर्द वह है जो अपने नफ़्स पर लगाम दे कर, और उस की बागें चढ़ा कर अपने क़ाबू में रखे, और लगाम के ज़रिये उसे अल्लाह की ना फ़रमानियों से रोके और उस की बागे थाम कर अल्लाह की इताअत की तरफ़ उसे खींच ले जाये।

 

ख़ुतबा- 235

(दोनों सालिसों (अबू मूसा व अम्र बिन आस) के बारे में और अहले शाम की मज़म्मत में फ़रमाया)

वह तुन्द ख़ूं, औबाश और कमीने बद क़िमाश (दुराचारी) हैं कि जो हर तरफ़ से इकठ्ठा कर लिये गये हैं और मख़्लूतुन नसब (मिथ्रित गोव्र) लोगों में से चुन लिये गये हैं। वह उन लोगों में से हैं जो जिहालत की बिना पर इस क़ाबिल हैं कि उन्हे (अभी इस्लाम के मुतअल्लिक़) कुछ बताया जाये, और शाइस्तगी सिखाई जाये (अच्छाई और बुराई की तालीम) दी जाये और (अमल की) मश्क़ कराई जाये। और उन पर किसी निगरानी को छोड़ा जाये, और उन के हाथ पकड़ कर उन्हे चलाया जाये। न तो वह मुहाजिर हैं न अंसार और न उन लोगों में से हैं जो मदीने में फ़रोकश थे।

देखो, अहले शाम ने तो अपने लिये ऐसे शख़्स को मुन्तख़ब किया है जो उन के पसंदीदा मक़सद के बहुत क़रीब है, और तुम ने ऐसे शख़्स को चुना है जो तुम्हारे ना पसंदीदा मक़सद से इंतेहाई नज़दीक है। तुम को अब्दुल्लाह बिन क़ैस (अबू मूसा) का कल वाला वक़्त याद होगा (कि वह कहता फिरता था) कि यह जंग एक फ़ितना है। लिहाज़ा अपनी कमानों के चिल्लों को तोड़ दो, और तलवारों को न्यामों में रख लो। अगर वह अपने इस क़ौल में सच्चा था तो (हमारे साथ) चल खड़ा होने में ख़ता कार है जब कि उस पर कोई जब्र भी नही, और अगर झूठा था तो उस पर (तुम्हे) बे एतेमाद होना चाहिये। लिहाज़ा अगर अम्र बिन आस के धकेलने के लिये अब्दुल्लाह बिन अब्बास को मुन्तख़ब करो। इन दिनों की मोहलत ग़नीमत जानो और इस्लामी (शहरों की) सरहदों को घेर लो। क्या तुम अपने शहरों को नही देखते कि उन पर हमले हो रहे हैं, और तुम्हारी क़ुव्वत व ताक़त को निशाना बनाया जा रहा है।

 

ख़ुतबा-236

(इस में आले मुहम्मद अलैहिमुस सलाम का ज़िक्र फ़रमाया है।)

वह इल्म के लिये बाइसे हयात और जिहालत के लिये सबबे मर्ग हैं। उन का इल्म उन के हिल्म का, और उन का ज़ाहिर उन के बातिन का, और उन की ख़ामोशी उन के कलाम की हिकमतों का पता देती है। वह न हक़ की ख़िलाफ़ वर्ज़ी करते हैं, न उस में इख़्तिलाफ़ पैदा करते हैं। वह इस्लाम के सुतून और बचाव का ठिकाना हैं। उन की वजह से हक़ अपने असली मक़ाम पर पलट आया। और बातिल अपने जगह से हट गया, और उस की ज़बान जड़ से कट गई। उन्हो ने दीन को समझ कर और उस पर अमल कर के उसे पहचाना है। यूं तो इल्म के रावी बहुत हैं मगर उस पर अमल पैरा हो कर उस की निगह दाश्त (संरक्षण) करने वाले कम हैं।

 

ख़ुतबा-237

जिन दिनों में उस्मान बिन अफ़्फ़ान मुहासिरे में थे तो अब्दुल्लाह बिन अब्बास उन की एक तहरीर ले कर अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम के पास आये जिस में आप से ख़्वाहिश की गई थी कि आप अपनी जागीर यंबों की तरफ़ चले जाये ता कि ख़िलाफ़त के लिये जो हज़रत अली (अ) का नाम पुकारा जा रहा है उस में कुछ कमी आ जाये, और वह ऐसी दरख़्वास्त पहले भी कर चुके थे, जिस पर हज़रत ने इब्ने अब्बास से फ़रमाया कि ऐ इब्ने अब्बास, उस्मान तो बस यह चाहते हैं कि वह अपने शुतुरे आब कश (पानी खींचने वाला ऊंट) बना लें कि जो डोल के साथ कभी आगे बढ़ता है और कभी पीछे हटता है। उन्हो ने पहले भी यही पैग़ाम भेजा था कि मैं मदीने से बाहर निकल जाऊं और उस के बाद यह कहलवा भेजा कि मैं पलट आऊं। अब वह फिर पैग़ाम भेजते हैं कि मैं यहां से चला जाऊं (जहां तक मुनासिब था) मैं ने उन को बचाया। अब तो मुझे डर है कि मैं (उन को मदद देने से) कहीं गुनहगार न हो जाऊं।

 

ख़ुतबा-238

ख़ुदा वंदे आलम तुम से अदा ए शुक्र का तलब गार है, और तुम्हे अपने इक़्तिदार का मालिक बनाया है, और तुम्हे इस (ज़िन्दगी के) महदूद मैदान में मोहलत दे रखी है ता कि सबक़त का ईनाम हासिल करने में एक दूसरे से बढ़ने की कोशिश करो। कमरे मज़बूती को कस लो और दामन गर्दान लो। बुलंद हिम्मती और दअवतों की ख़्वाहिश एक साथ नही चल सकती। रात की गहरी नींद दीन की मुहिमों में बड़ी कमज़ोरी पैदा करने वाली है, और (उस की) अंधयारियां हिम्मत व जुरअत की याद को बहुत मिटा देने वाली है।

व सल्लल्लाहो अला सैयिदना मोहम्मदिन नबीयिल उम्मी व अला आलेही मसाबीहुद्दुजा वल उरवतिल वुस्क़ा व सल्लमा तस्लीमन कसीरन कसीरा।